धर्म को छोड़ मत भाई,तुझे मुक्ति को पाना है।
धर्म को छोड़ मत भाई,
तुझे मुक्ति को पाना है।
दो दिन की जिन्दगी है,
यहाँ से सबको जाना है।।
धर्म को छोड़ मत भाई तुझे…….
फँसा है क्यों अरे मानव,
यहाँ कुछ भी न अपना है।
न कोई तेरा मेरा है,
यहाँ सब कुछ बेगाना है।
अरे तू चेत तो मानव,
यह जग अस्थिर ठिकाना है।।
धर्म को छोड़ मत भाई तुझे……
आकुलता को हटा मन से,
तू तज दे मोह ममता को।
सदा सच बोल, संयम धर,
बसा ले उर में समता को।
हटा दे पाप का पर्दा,
तुझे शिवपुर जो जाना है।।
धर्म को छोड़ मत भाई तुझे……
दिये उपदेश ऋषिवर ने,
तू उनको ध्यान में घर ले।
यह अवसर फिर न आयेगा,
यह नर तन सार्थक कर ले।
तू आजा उसके चरणों में,
यही सच्चा ठिकाना है।।
धर्म को छोड़ मत भाई तुझे…….










