समानी व कूतिः समाना हृदयानि वः।
समानम॑स्तु वो मनो या वः सुसुहास॑ति ।
ऋः १०. १६१.४
तर्जः मेले विन्निन मुत्ततारी-943/2453 राग-देस
ऐ प्यारे मनुष्य लोगों जितना है सामर्थ्य तुम्हारा
मिल के धर्म के संग सुख बाँटो
तुम जीवों के सुख के हेतु सदा करो पुरुषार्थ हृदय से
त्याग न कराना कभी धर्म का प्यारो,
रहें तुम्हारे मन हृदय भी बिना विरोध के प्रेमासक्त
मन को प्रेम संयम में बाँधो (2)
॥ऐ प्यारे॥
कामः (1)
पहली सोच मन में रखना आचरण को शुद्ध करना
रखना निस्वार्थ भावना।
सङ्कल्प
सुख समृद्धि विद्या आदि विविध गुणों के लिए ही
निज पुरुषार्थ को राधना
विचिकित्सा
जो जो हैं कार्य शंकित, यथावत निश्चित करके
विचिकित्सा के बल पे ही निर्णित बुद्धि को करके
तीनों स्तम्भ धर्म के हैं ठीक से धार लो।
॥ऐ प्यारे॥
(श्रद्धा) (2)
सत्य धर्म ईश्वर आदि शुभ गुणों के सार्थक साथी
रखना है इनमें ही विश्वास
अविद्या कुतर्क में रहना, ईश्वर पे शंका करना
अश्रद्धा अन्याय है निपात।
(घृति)
सुख दुःख हानि या लाभ इन सब में रखना धीरज
विचलित कभी ना होना है यही मानव की सीरत
कष्ट संकट विपद् दुःख में ना हिम्मत हारो॥
॥ऐ प्यारे ॥
(ही)
आचरण असत्य का करना, पवित पुण्य काम से बचना
दुरित मन का ही है ये असर
श्रेष्ठ गुणों को धारण करने वाली श्रेष्ठ बुद्धि को
धीः कहते धार ले सत्वर
(भीः)
जो आज्ञा है ईश्वर की ऋत सत्य का पालन करना
और पापाचरण के पतित विचारों से नित डरना
रख के साक्षी ईश को जन्म को तार लो।
॥ऐ प्यारे॥
इस प्रकार धर्म का सेवन करके पा लो अनुपम ज्योति
अन्यों का करते रहो भला
इक से दूजे का सुख बढ़े ऐसे कर्म करो बड़े,
होवे परहित में जी लगा सुख के दे मन हर्षा लो,
ना वैमनस्य ईर्ष्या लो कर कर के सबकी सेवा, बहे मन में प्रेम का रे ला
आओ मिल जुल के नित सबका हित साध लो॥
॥ऐ प्यारे ॥
(राधना) पूरा करना। (निपात) गिरा हुआ। (सत्वर) शीघ्र, जल्दी। (ऋत) सृष्टि, नियम।
(पतित) गिरा हुआ, नीच। (रेला) बहाव।













