धन को दूना करना चाहे
धन को दूना करना चाहे,
धर्म-कर्म में लाया कर।
अपना मान बढ़ाना चाहे,
सब को शीश झुकाया कर।
अपना ज्ञान बढ़ाना चाहे,
गुणी की सेवा ठाया कर।
“धर्मी”निर्भय होना चाहे,
ईश्वर के गुण गाया कर।
लोक में सारे जन जाने हैं,
चंदन शीतल होता है।
चंदा और भी शीतल होता,
और की गर्मी खोता है।
साधु की संगत में जो जन,
नित्य लगावे गोता है।
“धर्मी”इतना शीतल हो जा,
बीज बुरा ना बोता है।
दुष्ट मनुष्य सुन सज्जन वाणी,
सब में हंसी उड़ाता है।
कौवा कोयल के संग बोले,
फुला नहीं समाता है।
दादुर पीपी टेर सुने तब,
अपनी टेर लगता है।
बगुला हंसी,हंस की करता,
जब वह शब्द सुनता है।
अर्थ हेतु अर्थाती निशदिन,
भजन ईश का करता है।
आर्त मनुष्य जब पाप करत है,
श्वांस कष्ट का भरता है।
जिज्ञासु जब खोज करत है,
सोच सोच पग धरता है।
ज्ञानी ज्ञान के द्वारा जाने,
पाप कर्म से डरता है।










