देश धर्म के काम जो आये (धुन-चल दरिया में डूव जायें)
देश धर्म के काम जो आये
उनको कैसे भूल जायें।
परोपकार में प्राण गंवाये,
उनको कैसे भूल जायें।। टेक ।।
भारत को आजाद कराना
एक किसी का काम नहीं।
बहुतों को हम तुम सब जानें
याद बहुत के नाम नही ।।
है कदर हमारे दिल अन्दर
उन देश भक्त नौजवानों की।
जानों की अनजानों की
मरदानों के बलिदानों की ।।
मौत से हंसकर हाथ मिलाये
उनको कैसे भूल जाये।।1।।
एक नहीं दो चार नहीं अनगिन
फांसी ऊपर लटके डुबा दिये
कुछ जला दिये कुछ देश
विदेशों में भटके ।।
धरती पै कभी अम्बर में
वायु में अथाह समन्दर में।
क्लासों में इजलासों में
गुरूद्वारा मस्जिद मन्दिर में।
क्रांति के शोले भड़का ये,
उनको कैसे भूल जायें। ।2।।
घर दरजर हर नर सर
कर डर पर डर निश्चर देते थे।
देश प्रेम के अमर पुजारी,
हंसकर दुख हरलेते थें
कभी गोलियों की बौछारों में,
हन्टरबैंतों की मारों में।
खूनी फव्वारों में न्हाये,
अनको कैसे भूलो जायें।।3।।
सारी दुनिया के अन्दर
जब कोई नहीं हमारा था।
नाव भंवर में डोर रही थी,
हम से दूर किनारा था।।
हाथों में चप्पू ले करके,
नाव किनारे पर लाये।
पार समन्दर फेंके बन्दर
हमको शुभ दिन दिखलाये ।।
उत्तम ‘प्रेमी’ की कवितायें,
उनकों कैसे भूल जाये। 4।।










