देखों कैसे उल्टे-उल्टे काम हो रहे हैं
देखों कैसे उल्टे-उल्टे
काम हो रहे हैं,
छिप-छिप करके नहीं
सरे आम हो रहे हैं।। टेक ।।
नग्न हैं वदन भूखी
सूखी हैं अन्तड़ी,
छिपाने को सिर जिन
पै झुग्गी ना झोपड़ी,
उनके लिये कल्लचर
प्रोगाम हो रहे हैं।।1।।
देश द्रोही पापी मस्त
दावतों में, खेलों में,
श्रमिक देश भक्त आज
सड़ रहे हैं जेलों में,
नेकी करने वाले ही
बदनाम हो रहे हैं।।2।
प्रजा तन्त्र बे मुहार
कोई रोक टोक ना,
चीखों-चिल्लाओ
लगे पत्थर पै जौक
ना गद्दारों को झुक
कर सलाम हो रहे हैं।।3।।
दिल हैं विदेशी तन पर
देशी वस्त्र खादी के,
अपने ही हाथों आज
अपनी बराबादी के,
शोभाराम प्रेमी सब
इन्तजाम हो रहे हैं।।4।।










