Home आर्य समाज भजन देखो सोम प्रभु की अनोखी सृष्टि

देखो सोम प्रभु की अनोखी सृष्टि

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अ॒यं द्यावा॑पृथि॒वी वि ष्कंभायद॒यं रर्थमयुनक्स॒प्तर॑श्मिम् ।

अ॒यं गोषु शच्या प॒क्म॒न्तः सोमो दाधार् दशयन्त्रमुत्स॑म्

।। ऋः ६.४४.२४

तर्जः मैं तो साँवरे के रंग राती-2714 (राग-कलावती)

प्रभु दीख रहा है विश्वव्यापी (2)
द्यावा पृथिवी का वो है परिभू
हरदिश में जिसकी है ख्याति ॥
॥ दिख रहा ॥

वन उपवन गिरी सरित सिन्धु का (2)
भार तो वसुधा उठाती
पर वसुधा को प्रभु की शक्ति (2)
हर पल रही चलाती॥
॥ दिख रहा ॥

सप्तकिरण वाले रवि-रथ का (2)
चालक प्रभु अभ्यासी
अस्त प्रतीची में रवि होकर (2)
दौड़, पहुँचता प्राची॥
॥ दिख रहा ॥

गौ के स्तनों में दूध छलकता (2)
घास चारा जो खाती
सोम प्रभु की महिमा ही तो (2)
दूध की नदियाँ बहाती
॥ दिख रहा ॥

(परिभू) परिपालक। (वसुधा) पृथ्वी। (प्रतीची) पश्चिम। (प्राची) पूर्व।