देखल्यो बाड़ खेत खावै ।

0
26

देखल्यो बाड़ खेत खावै ।

देखल्यो बाड़ खेत खावै ।
मारै लट्ठ अकल के पाछे
किसनै समझावै ॥ टेक ॥

भाई-भाई करें लड़ाई
देखैं पंचाती।
इबकै धरती बीच गाड़ दूं
कूट रहयो छाती।
नींव आंगण माँह खुदवावै।
धन धरती और माल बांट,
माँ बाप भी बंटवावै।।1।।

सास बहू की पटती कोन्या,
छोरो घणों उदास।
ननद जिठानी देवरानी ना
बैठे कोई पास।
पडोसन भी चुगली खावै।
खुद नै माने सही गलत
औरां नै बतळावे ॥ 2।।

गाँमा की गति न्यारी हो गई,
उल्टै सगले काम।
पंच पक्षधर हो ज्याते
जिसकी अंटी माँह दाम।
बोतल दारू की प्यावै ।
कितनी बोलो साँच झूठ के
तलै दबी पावै।।3।।

खड़े खेत दो दाणे हो
ज्याँ चौड़ा हो हाँडै।
एक-एक ने लेऊँ देख
यो आँकल सा टाँडै।
ऐंठ दूजे की निकलावै।
पोदीना ले बीत बीच
माँह करज चढ्‌यो आवै।।4।।

ब्याह शादी और पेज भात
के खरचे बेशुम्मार।
आगा पीछा सोच बावले
मँहगाई की मार।
‘मनहर पाछे पछतावै ।
घर-घर होगई दशा बुरी,
मन क्यों ना घबरावै। 5।।