देश की खातिर जो सीनों पर खा-खा मर गए गोलियाँ।
देश की खातिर जो सीनों पर
खा-खा मर गए गोलियाँ।
उनके बलिदानों की
ये नेता बोल रहे हैं बोलियाँ।
ये कैसा सितम है-
ये कैसा सितम है।
बलकारी था तपधारी था,
सदाचारी था न्यायकारी था।
स्वतंत्रता की नींव घरी,
वो दयानन्द ब्रह्मचारी था।
सच्चा देव पुजारी था,
देशभक्त हितकारी था।
‘खेमचन्द’ एक लालबहादुर
अपने हाथ से खो लिया…।
ये रेल में थे हम जेल में थे,
ये सहेल में थे हम दहेल में थे।
यही राज पर कब्जा कर गाए,
जो अंग्रेज की गैल में थे।
हम सब धक्कापेल में थे,
कहीं जलाए तेल में थे।
राजगुरु सुखदेव, भगतसिंह
फांसी चढ़ गई टोलियाँ….।
एक ऊधम था वो क्या कम था,
मानो बम था एटमबम था।
बाप का बदला लेकर छोड़ा,
उसी बहादुर का दम था।
इक्कीस वर्ष का मातम था,
उसको यही रजोगम था।
लन्दन में जाकर के जिसने
खेली खून से होलियाँ….।
नौजवान गए बलवान् गए,
किसान गए विद्वान् गए।
नहीं आज तक आने पाए,
बहुत वीर अण्डमान गए।
कर न्यौछावर जान गए,
छोड़ के हिन्दुस्तान गाए।
मारा-मारा फिरा बेचारा
सुभाष लेकर टोलियाँ…..










