देख ईश्वर की लीला निराली

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देख ईश्वर की लीला निराली

देख ईश्वर की लीला निराली
नयनवाँ खुली 2 जायें।
लखि पूरब से सूरज की लाली,
नयनवाँ खुली खुली जायें ॥

रस्सी न खूटा न बल्लि लगाया,
बेजोड़ अम्बर का तम्बू बनाया,
तारों से हीरों से उसको सजाया,
जुगुनु की भांति है जो जगमगाया,
देख चन्दा के फूलों की थाली।

धरती को फूलों फलों से सजाया,
पेड़ों की डाली से स्वागत कराया,
सागर नदी और झरने बहाया,
जंगल पहाड़ों से मौसम सुहाया,
सावन की लख घटा काली।

गन्ने में रस दी खटास इमली में,
बगुले को सादा रंगीन तितली को,
बादल को गर्जन चमक बिजली को,
पत्थर को सख्ती कोमल कलि को,
पौधे की लखि हरियाली।

पाके महानन्द मानुष का चोला,
भगवन की भक्ति से भरले तू झोला,
कर शुभ कमाई न बन जाना भोला,
एक दिन उठेगा तुम्हारा खटोला,
देख जाते समय हाथ खाली।

कभी मनुष्य को, भगवान की खोज थी।
आज भगवान को मनुष्य की खोज है ।