दायरा अकीदा बात का बिल्कुल जरा सा हो गया।
दायरा अकीदा बात का,
बिल्कुल जरा सा हो गया।
जाने क्यूँ अब ये जमाना,
मसखरा सा हो गया।।
जब सज़ा जुल्मों की देता,
आसमाँ वाला हमें।
बोल देते हैं खुदा खोटा,
खरा सा हो गया।।
नातवाँ है सच कहूँ मैं,
आज का ये आदमी।
जानकर अब ये हकीकत,
क्यों डरा सा हो गया।।
आ रहा सूखा नज़र
ज़िन्दगी का ये शज़र।
कह रहे मजबूर होकर,
ये हरा सा हो गया।
आ गया तूफाँ भयंकर,
चाह रहा तस्कीन तू।
ज़ामे उल्फ़त के बिना,
तू अदमरा सा हो गया।
वज़्हे गिरिया-ए-ख़ूनी,
क्या बताऊँ ओ “सचिन”।
पाक और नापाक अब तो,
एक सरा सा हो गया।










