दयानन्द था एक रौशन मुनारा ।
तर्ज – बहुत प्यार करते है
दयानन्द था एक रौशन मुनारा ।
कि चमका दिया जिसने संसार सारा।।
दयानन्द था एक रौशन मुनारा …..
ज़मी के कणों को गगन पर चढ़ाया ,
सितारों को जिसने ज़मीं पे उतारा ।
दयानन्द था एक रौशन मुनारा …..
खि़जां को चमन से उठा दूर फेंका ,
बहारों को लाया वह पकड़ के दोबारा।
दयानन्द था एक रौशन मुनारा …..
उधर हो गया रूख उठे हर तूफां का ,
किया जिस तरफ उस ऋषि ने इशारा।
दयानन्द था एक रौशन मुनारा …..
भंवर में पड़े हम बहे जा रहे थे ,
उसी की कृपा से मिला फिर किनारा।।
दयानन्द था एक रौशन मुनारा …..
’पथिक’ महर्षि की दया गर न होती ,
जहां में न होता ठिकाना तुम्हारा।
दयानन्द था एक रौशन मुनारा …..










