दयानन्द ने वेदों का जब सूरज चमकाया।

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दयानन्द ने वेदों का जब सूरज चमकाया।

दयानन्द ने वेदों का
जब सूरज चमकाया।
सदियों के भटकतों को
फिर राह नजर आया॥ टेक ॥

उजड़ी थी ये बगिया तो
किसने फिर महकादी।
प्यासों के लिए किसने
अमृत सी छलकादी॥
किसी लगता परिश्ते का
धरती पै पड़ा साया ॥1॥

कहते थे ये कौन आया
किया जिसने ये एहसां है।
भेजा हवा कुदरत का
कोई लगता महरबां है॥
जीने की निराशा में
आशा की किरण लाया ॥2॥

नफरत के सिवा यहां पर
कभी प्यार मिला न जिन्हें।
इस धरती पै जीने का
अधिकार मिला न जिन्हें॥
हंसी आई उन्हें अपने
अधिकार को जब पाया ॥3॥

कर्मठ क्या तू पायेगा
ऋषिवर में जो मस्ती थी।
ठुकरा दिया हस्ती को
वह भी कोई हस्ती थी॥
उस हस्ती ने दुनिया को
एक बार में दहलाया॥4॥