दयानन्द ने दोबारा कभी जाके घर ना देखा।
दयानन्द ने दोबारा
कभी जाके घर ना देखा।
वैराग्य हो तो ऐसा मुड़कर
उधर ना देखा॥ टेक ॥
दिन रात मिलने खातिर
माँ बाप तड़फे होंगे।
फिर ख्वाब में भी अपना
लख्तेजिगर ना देखा ॥1॥
नक्षत्र मूल में ही
माँ ने जन्म दिया था।
किसी माँ का मूल जैसा
अब तक पिसर ना देखा॥2॥
सच्चाई जानने की
लेकर चला तमन्ना।
मंजिल से पहले उसका
रुकते सफर ना देखा ॥3॥
बरसात सर्दी गर्मी
बर्फीली नदियों का भी।
संयम की साधना पर
होते असर ना देखा ॥4॥
क्या जर जमी हसीनों के
चेहरों की ओर भी।
एक बार भी उठाकर
ऊपर नजर ना देखा ॥5॥
जिसने भी देखा उसको
कहता गया तभी से।
देखे हैं जादूगर तो ऐसा
जादूगर ना देखा ॥6॥
दुनिया ने पत्थरों से
किया वार खंजरों से।
बख्शा सभी को फिर भी
ऐसा दिल जिगर ना देखा ॥7॥
पत्थर तो रहबरों की
तकदीर में लिखे हैं।
चखा तल्खिये जहर भी
गम उम्र भर ना देखा॥8॥
सदके ऋषि के वेद की
शमां जला के खुद भी।
ऐसा गया जहां से कोई
जाते नर ना देखा ॥9॥










