दयानन्द की जय मनाते चलेंगे।

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दयानन्द की जय मनाते चलेंगे।

दयानन्द की जय मनाते चलेंगे।
कदम आगे आगे बढ़ाते चलेंगे।
बनायेंगे हम आर्य संसार भर को ,
ध्वजा ओम् की हम उठाते चलेंगे।

जो आवाज़ सुन के खुले पोल सब की ,
वह वेदों का डकां बजाते चलेंगे।

रहें ब्रह्मचारी बनें व्रत धारी ,
सदाचार के गीत गाते चलेंगे।
कभी शान ऋषियों की मिटने न देंगे ,
यह है फ़र्ज अपना निभाते चलेंगे।

दबेंगे नहीं हम किसी के दबाये ,
दबायें जो उस को दबाते चलेंगे ।

न मर कर मिले जब तलक जिन्दगानी ,
चह जीवन की बाज़ी लगाते चलेंगे।
’पथिक’ और होंगे मुकर जाने वाले ,
कहेंगे जो कर के दिखाते चलेंगे ।