चिट्ठी लिखकर सुदेशा ने रख दई मेज पर

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चिट्ठी लिखकर सुदेशा ने रख दई मेज पर

चिट्ठी लिखकर सुदेशा ने
रख दई मेज पर,
चल दई बलिदान होने
देवी आज दहेज पर,
तेल मिट्टी का उलटकर
छिड़क कपड़ों पर लिया,
स्वार्थी दुनिया से हटकर
ध्यान प्रभु का धर लिया


उठाके माचिस पकड के तिल्ली
जब लगाया आग को,
यू लगी व फूंकने लालच के
जहरी नाग को, आग की लपटों में
जिस्में पाक अब जलने लगा,
साथ हिन्दू कोम का अखलाक
अब जलने लगा,
चण्डिका के हाथ से शेतानियत
जलने लगी

और इधर इन्सान की
रसानियत जलने लगी,
वस्त्रों से देवी के
पिगारिया झड़ने की,
उधर लोभी बन्दों को
मक्कारियां झड़ने लगी,
दहेज के लालच ने लेली
जान एक मासूम की.

हो गई यूं मुश्किलें आसान
एक मासूम की,
चन्द मिन्टों में ही वह
किस्मत की हेटी जल गई,
लोभ की भट्टी में वह
आदर्श टी जल गई,
राख उसकी कह रही है
आज हर इन्सान को,
इस कुरीति से बचा लो
अब भी हिन्दुस्तान को.