चिन्तन करले तू प्राणी
सर्वाधार का हाँ।
रचने हारा है जो की
कुल संसार का हाँ।।
बागे दुनियां की है
कैसे रचना करी।
जरें जरें के अन्दर
क्या लीला भरी।
कैसा सुन्दर है माली
इस गुलजार का हाँ।।
चिन्तन करले…….
जीव रूपी क्या बूटे
सजाकर धरे।
भोगे कर्मों को प्राणी
करे और भरे।
कैसा सुन्दर है न्याय
यह दरबार का हाँ।।
चिन्तन करले…..
जितनी वस्तु का चाहे
जितना भोग करें।
फिर भी देखो खजाने
भरे के भरे।
कैसा पूरण भंडारी है
भंडार का हाँ।।
चिन्तन कर ले…..
वह मनुष्य किस काम का,
वह जिन्दगी किस काम की।
जिसने न लौ जगाई,
प्रभु के प्यारे नाम की।।










