चौदह साल का बालक एक हकीकत था

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चौदह साल का बालक एक हकीकत था

चौदह साल का बालक एक हकीकत था
जंजीरों में जकड़ा खड़ा दरबार में था

काजी ने पूछा क्या है तुझे ईमान क़ुबूल?
रहना है जिन्दा तुझको या मरना है क़ुबूल?

काजी ने कहा फिर से है ईमान क़ुबूल?
भीड़ से शोर उठा, कर ले ईमान क़ुबूल

इतने में हकीकत गरजा सुन काजी!
तुम कहते हो मैं कर लूं ईमान क़ुबूल?

हकीकत को बस ओऊम का है नाम कबूल
प्रभु के भक्त कभी बनते हैं गुलाम ए रसूल?

काजी ने कहा कर दो सर इसका कलम
गुस्ताख को मारो, करो फितने को खतम

अगले ही पल वो सर हुआ जुदा तन से
एक धुन सी उठ रही थी उस गर्दन से

धर्म की राह में मर जाते हैं मरने वाले
मर के जी उठते हैं शान से गुजरने वाले।।