चली जा रही है, यह जीवन की रेल।
चली जा रही है, यह जीवन की रेल।
समझकर खिलौना, इसे यों ना खेल।।
कुशल कारीगर ने है, इसको बनाया।
बड़ी अकलमन्दी से, है इसको चलाया।
पड़े इसके इंजन में कर्मों का तेल।।
चली जा रही है, यह जीवन……..
किसी को चढ़ावे, किसी को उतारे।
घड़ी दो घड़ी के, मुसाफिर हैं सारे।।
यहीं पर जुदाई, यहीं पर हो मेल।।
चली जा रही है, यह जीवन…….
जरा-सी खराबी, अगर इसमें आवे।
कदम एक भी यह, सरकने न पावे।।
सदा के लिए, एक पल में हो फेल।।
चली जा रही है, यह जीवन……….
न अपनी खुशी से, यहाँ लोग आये।
मगर सबने आकर, यहाँ दिन बिताये।।
कोई समझे मंदिर, कोई समझे जेल।।
चली जा रही है, यह जीवन…….
रहे कुछ सफर भर, में रोते-चिल्लाते।
मगर कुछ महापुरुष, हँसते-हँसाते।।
गये हर मुसीबत को, हिम्मत से झेल।।
चली जा रही है, यह जीवन……..
‘पथिक’ रेलगाड़ी पे जो भी चढ़ा है।
कहीं न कहीं पर, उतरना पड़ा है।।
समय ने डाली है, सभी को नकेल ।।
चली जा रही है, यह जीवन………










