सत्संग
चल सत्संग में, रंग जा रंग में,
हंस-हंस जीवन जी ले।
अमृत बरसे, फिर क्यों तरसे,
प्याले भर-भर पी ले।।
सत्संग में कर दे दूर अन्धेरे।
काटे जन्म-जन्म के फेरे।।
भाग्य बनें चमकीले।
चल सत्संग में, रंग जा रंग में… ।।1।।
बैठ यहाँ पर ध्यान लगा ले।
परमेश्वर की महिमा गा ले।।
सत्संग को मस्ती ले।
चल सत्संग में, रंग जा रंग में….।।2।।
वेद प्रभु की अमृत वाणी।
पतित पावनी शुभ कल्याणी।।
सुन ले मन्त्र रसीले।
चल सत्संग में, रंग जा रंग में…..।।13।।
फिर कुछ नहि बन पाएगा।
हाथ मसलता रह जाएगा।।
अंग हुए जब ढीले।
चल सत्संग में, रंग जा रंग में……….।।4।।
इस दुनियाँ में हो गुजरे हैं।
सुन्दर अवसर खो गुजरे हैं।।
कितने छैल छबीले।
चल सत्संग में, रंग जा रंग में…….।।5।।
कल का ‘पथिक’ भरोसा क्या है।
कल क्या होगा किसे पता है।।
सोच जरा गर्वीले।
चल सत्संग में, रंग जा रंग में………।।6।।










