चमकेंगे जब तलक ये, सूरज व चांद तारे।

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चमकेंगे जब तलक ये, सूरज व चांद तारे।

चमकेंगे जब तलक ये,
सूरज व चांद तारे।
हम हैं ऋषि दयानन्द,
तब तक ऋणी तुम्हारे ।।

भारत की जब ये नैया,
मंझधार में पड़ी थी।
तूने ही बनके केवट,
पहुँचा दिया किनारे ।।
हम हैं ऋषि दयानन्द,
तब तक ऋणी तुम्हारे ।।1।।

हमको पिलाया अमृत,
खुद जहर पी गया तू।
तूने हमारे खातिर,
सब कष्ट थे सहारे ।।
हम हैं ऋषि दयानन्द,
तब तक ऋणी तुम्हारे।।2।।

कातिल को अपने स्वामी,
जीवन का दान दे तू।
तेरी जान के भी दुश्मन,
तुझे जान से थे प्यारे ।।
हम हैं ऋषि दयानन्द,
तब तक ऋणी तुम्हारे।।3।।

तू वो दीया था जिसने,
लाखों दीये जलाये।
दी रोशनी ‘पथिक’ वो,
घर जगमगाये सारे।।
हम हैं ऋषि दयानन्द,
तब तक ऋणी तुम्हारे।।4।।

“वे इतने अच्छे और विद्वान आदमी थे कि प्रत्येक धर्म के अनुयायियों के लिए सम्मान के पात्र थे – सर सय्यद अहमद खां