ब्रह्मचारी उदयवीर:एक संक्षिप्त परिचय

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ओ३म्

आर्यसमाज का गौरव

अमर बलिदानी ब्रह्मचारी उदयवीर

प्रस्तावना-

भैयापुर (लाढ़ौत) बात पुरानी है लगभग 30 वर्ष पुरानी। गुरुकुल भैयापुर-लाढ़ौत अभी बन ही रहा था, कुछ ही बन पाया था, एक वर्ष उसे हो गया था। एक और गौवों का छप्पर था, कुल दो ही गौवें थी, पश्चिम में एकमात्र छप्पर वाली मेरी अपनी कुटिया थी, उधर पूर्व में एक भारी सा कीकर का पेड़ था। चारों और हरे भरे खेत, शान्त, एकान्त और रमणीय वातावरण।

गुरुकुल के वार्षिकोत्सव पर हमने ब्रह्मचारियों के प्रवेश की घोषणा की जिसे सुनते ही जनता में हर्ष की लहर दौड़ गई। लोगों में गुरुकुल को लेकर अत्यन्त उमंग और उत्साह था, क्योंकि गुरुकुल का उद्घाटन एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी द्वारा किया जा रहा था। परम तपस्वी, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, उद्भट विद्वान्, धर्मरक्षक, गोभक्त, संस्कृति समुद्धारक और सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान आचार्य श्री बलदेव जी ने स्वयं अपने पवित्र कर कमलों से गुरुकुल की आधारशिला रखी थी। उनकी विशेष ख्याति के कारण प्रवेशार्थियों की लम्बी लाइन लग गई। परन्तु स्थानाभाव और व्यवस्था की दृष्टि से कुल बीस ब्रह्मचारी ही प्रविष्ट किये गये। उन्हीं ब्रह्मचारियों में एक दिव्य ब्रह्मचारी था उदयवीर

गुरुकुल का प्रारम्भिक स्वरूप :

ब्रह्मचारी उदयवीर का जन्म गाँव बलियाना, जिला रोहतक में श्री रामफल जी के घर हुआ। इनकी माता का नाम श्रीमती शीला देवी था। प्राथमिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की। गुरुकुल खुलने पर पिता ने उदयवीर को गुरुकुल की छठी कक्षा में प्रविष्ट कराया। कक्षा में कुल दस ब्रह्मचारी थे। प्रारम्भिक समय गुरुकुल का स्वर्णिम युग था, पांचवें वर्ष तक गुरुकुल में 80 ब्रह्मचारी अन्तेवासी बनकर अध्ययन कर रहे थे। उस समय गुरुकुल में किसी ब्रह्मचारी या अध्यापक को कहीं ताला लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। यम-नियमों का पालन दण्डे से नहीं स्वतः अन्तः प्रेरणा से किया जा रहा था। प्रत्येक प्रातः सन्ध्या और यज्ञ के उपरान्त मेरा अपना प्रेरक उपदेश होता था। वर्ष में केवल चार दिन का सामूहिक अवकाश होता था। दिनचर्या अत्यन्त नियमित होती थी। संस्कृत और धर्मशिक्षा की घण्टी मैं स्वयं लेता था।

शिक्षा-दीक्षा :

ब्रह्मचारी उदयवीर में कुछ विलक्षण गुण थे वह विश्राम के क्षणों में भी मेरे पास आकर प्रकृति, परमात्मा और आत्मा सम्बन्धी विषयों पर चर्चा करता और समाधान प्राप्त करता। मोक्ष क्या है? जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है? क्या पुनर्जन्म भी होता है? इन्हीं चर्चाओं में अपने साथियों में व्यस्त दिखाई दिया करता था। कभी-कभी सहपाठियों के साथ उपरोक्त विषयों को लेकर वाद-विवाद हो जाता तो दोनों पक्ष मेरे पास आकर समस्या का समाधान प्राप्त करते। झगड़ा था उन्हीं बातों का। शोर था इन्हीं बातों का। इस प्रकार के वातावरण में ब्रह्मचारी उदयवीर के गुणों का परिमार्जन होता चला गया। यह निखरता निखरता अन्यों से विशिष्ट दिखाई देने लगा। मैं भी ऐसे शिष्य को देख कर गद्गद् हो जाया करता और स्नेहातिरेक से अभिभूत होता। किसी कवि ने कहा है –

शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे। साधवो नहि सर्वत्र चन्दनं नैव वने वने।

प्रत्येक पर्वत में मणि नहीं मिलते, हर हाथी के मस्तक में मोती नहीं बनते। सज्जन भी सभी नहीं बनते। हर वन में चन्दन के पेड़ नहीं उगते ।

ब्रह्मचारी उदयवीर की माता धन्य हैं। पिता सौभाग्यशाली हैं जिन्होंने उसे जन्म देने का सौभाग्य पाया। ऐसे व्यक्तियों के बारे में क्या अधिक कहें

“कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन । विमुक्ति मार्गे सुखसिन्धुमग्नं लग्नं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः ।।”

ब्रह्मचारी उदयवीर ने क्रमशः पढ़ते हुए गुरुकुल में 10वीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली जो योग्यता की दृष्टि से 12वीं के समकक्ष थी। पाठ्यक्रम गुरुकुल कांगड़ी का था। पाठ्यक्रम की गुणवत्ता थी कि विद्याधिकारी उत्तीर्ण छात्र सीधे शास्त्री में बैठ सकता था। किमधिकेन प्रखर बुद्धिमान् ब्रह्मचारी उदयवीर ने शास्त्री करने की इच्छा प्रकट की उस समय गुरुकुल में शास्त्री की व्यवस्था नहीं हो सकी थी।

पौरोहित्य :

मैंने विचार किया कि ब्रह्मचारी की शास्त्री भी हो जाये और इस संस्कारवान् छात्र के संस्कारों में भी कोई कमी न आये पर्याप्त मन्थन के बाद निश्चय हुआ कि महात्मा वेदपाल द्वारा स्थापित आर्यसमाज थर्मल प्लांट पानीपत में पौराहित्य का कार्य करते हुए पढ़ाई की जाये, साथ-साथ कुछ वक्तृत्व कला का अभ्यास भी होगा। बुद्धिमान् है शास्त्री तो कर ही लेगा, क्योंकि महात्मा वेदपाल जी के निरीक्षण और अनुशासन में बिगड़ने का तो प्रश्न ही नहीं हो सकता।

ब्रह्मचारी ने अच्छे अंकों से शास्त्री तो की ही आर्यसमाज थर्मल कॉलोनी में ऐसा अभूतपूर्व प्रभाव छोड़ा कि अब तक भी उस समाज को इतना अच्छा पुरोहित नहीं मिल पाया, कॉलोनी के छात्रों को बुलाकर शिविर लगाये, भाषण प्रतियोगिताएं कराई, प्रौढ़ पुरुषों और छात्रों को योगाभ्यास प्रारम्भ कराया। साथ-साथ चिकित्सा के योग भी सिखाए। इस ब्रह्मचारी के कारण आर्यसमाज में आकर लोग अपना अहोभाग्य समझते थे। वहां रहते भी मुझ से निरन्तर सम्पर्क बना रहा।

पुनः गुरुकुल में :

अब इस ब्रह्मचारी को मैंने पुनः गुरुकुल में बुला लिया और संस्कृत अध्यापक के रूप में रख लिया। पूरे एक वर्ष पश्चात् एक दिन ब्रह्मचारी ने मुझे कहा कि गुरु जी कुछ अलग से बातें करना चाहता हूँ। मैंने ब्रह्मचारी को समय दिया तो कहने लगा कि गुरु जी ! आप हमें बार-बार कहा करते थे कि प्यारे ब्रह्मचारियों ! श्रेय और प्रेय दो मार्ग होते हैं। प्रेय-सांसारिक सुख के लिए, अच्छे कर्म करते हुए क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थादि आश्रमों में होते हुए सुख से जीवनयापन करना। दूसरा श्रेय मार्ग-ब्रह्मचर्यपूर्वक साधना तपस्या करते हुए वेद-वेदांग, उपनिषद् तथा छः शास्त्रों को पढ़कर अधिकाधिक अपना और पराया उपकार करते हुए मुक्ति पथ का पथिक बनना। “महर्षि दयानन्द, नेता जी सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल जैसों के भी परिवार थे, माता-पिता, भाई-बहन, धनधान्य सभी कुछ तो इनके पास था, वे भी अपने-अपने घरों में सुख से मौज मस्ती मना सकते थे, वे सब भी सब सांसारिक सुख भोग सकते थे लेकिन उन्होंने हम देशवासियों के लिये अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिये अपने जीवनों को हंसते हुए धर्म की बलिवेदी पर स्वाहा कर दिया। “ गुरु जी आप प्रायः यह भी कहा करते हैं कि मैंने ब्रह्मचारी उदयवीर को बीच में ही रोक कर कहा कि तुम कहना क्या चाहते हो ?

“गुरु जी। मैं यही कहना चाहता है कि मैं प्रेय नहीं श्रेय मार्ग अपनाना चाहता हूँ। मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहकर देश धर्म और समाज के लिये समर्पित होना चाहता हूँ।”

“उदयवीर भावुक मत बनो यह मार्ग बहुत कठिन है। फिसलने की, अपितु गिर पड़ने की अत्यन्त संभावना है यह कांटों भरा मार्ग है?”

“आपने हमें काटों पर ही चलना सिखाया है। मुझे औरों की तरह एक अध्यापक मात्र या सामान्य जन बनकर जनसंख्या वृद्धि करके देश पर भार नहीं बढ़ाना है।”

“क्या, खूब सोच समझ लिया है?”

“हाँ गुरु जी ! मैंने अच्छी प्रकार पूरा समय लगाकर विचार कर लिया है। मैं अपने निश्चय पर दृढ़ हूँ। आप मुझे दीक्षा दें।”

“ब्रह्मचारी ! तेरे इस निश्चय पर मैं अत्यन्त प्रसन्न हूं, परन्तु अभी आयु कम है?”

“गुरु जी आप ही कहा करते हैं- “रण, भक्ति और दान, तीनों काम-करे जवान।” फिर आयु भी कम नहीं मैं अब पच्चीसवें वर्ष में हूँ।

“क्या माता-पिता को समझा लोगे ?”

“उन्हें मैं स्वयं समझा लूंगा और यदि वे नहीं समझेंगे तो भी मैं अब पीछे नहीं मुहूँगा।”

उसके दो महीने बाद वार्षिक महोत्सव पर प्रातः गुरुकुल की यज्ञशाला पर मैंने ब्रह्मचारी उदयवीर को नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी। यज्ञवेदी पर उपस्थित उसके माता-पिता ने भी अपने पुत्र को सहर्ष आशीर्वाद दिया। बड़ा ही लोमहर्षक दृश्य था, खचाखच भरे यज्ञ मण्डप में उपस्थित नर-नारी भाव विभोर हो रहे थे, जब ब्रह्मचारी उदयवीर काषाय वस्त्र धारण करके और दण्ड धारण करके भिक्षा की परम्परा का निर्वहन करते हुए भिक्षा मांगने लगा। किं बहुना, मैंने विचार किया ब्रह्मचारी अभी अधूरा है, विद्वत्ता नहीं है। इसे संस्कृत से एम.ए. या आचार्य करना ‘चाहिये। इसे वेद और दर्शन पढ़ने चाहिये। इसे सबसे पहले व्याकरण का विद्वान् होना चाहिये। जिसका स्वयं का निर्माण अधूरा है वह दूसरों का क्या निर्माण करेगा। गुरुकुल का आचार्य भी बनेगा तो भी विद्वान् तो होना ही चाहिए।

इत्यादि योग्यता अर्जित करने के विचार से मैंने उसे तैयार किया कि आप गुरुकुल कालवा जाकर व्याकरण की योग्यता बनाओ। लेकिन ब्रह्मचारी ने आग्रहपूर्वक स्वामी सत्यपति के दर्शन योग महाविद्यालय जाने की अनुमति प्राप्त कर ली। मैंने कहा “जहां आपको अनुकूलता हो बेशक जाओ लेकिन उपरोक्त योग्यता अवश्य प्राप्त करो। यहाँ गुरुकुल का कार्य तो में चला ही रहा हूँ। अब आप मूलशंकर हो दयानन्द बनकर आना।” ब्रह्मचारी रोजड़ गुजरात में, अजमेर राजस्थान में तथा उत्तरकाशी स्वामी वेदानन्द के आश्रम में कई स्थानों पर विद्वत्ता, योग्यता और साधना करता रहा दो तीन वर्ष लगा दिये इसी बीच अपने साथी स्वामी ब्रह्मानन्द के आश्रम दूधहेड़ी जिला मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश में भी व्यायाम और ब्रह्मचर्य की साधना करता रहा अभी दो वर्ष पूर्व पुनः मेरे पास गुरुकुल में आ गया। मैंने पूछा :

“इतनी जल्दी क्यों आ गये वत्स अभी और पढ़ते ?”

“गुरु जी ! सच ही बता दूं।”

“हाँ सच ही बता दो और मुझ से झूठ बोलोगे ?”

गुरुजी ! गुरुकुल के इतने बड़े कार्य को आप अकेले और शरीर से असमर्थ होकर भी इस आयु में करते हुए कितना कष्ट पा रहे होंगे यह सोचते-सोचते मैं व्याकुल हो उठता था, मेरी विद्या बाधित होती रहती थी मैं पढ़ नहीं पाता था।” “यह आपने अच्छा नहीं किया। गुरुकुल का कार्य तो ईश्वरीय कार्य है, इसे मैं नहीं कर रहा स्वयं ईश्वर ने ही मुझे कार्य करने की शक्ति दी है, वही सब करा रहा है। हम तो निमित्त मात्र हैं। तथाऽस्तु ।

“तथास्तु का तात्पर्य गुरु जी !”

“अब जब आप आ ही गये हो तो मैं आपसे सहमत हूँ।”

अब ब्रह्मचारी 29 वर्ष के हो चुके थे। उनके मनोभावों के अनुरूप मैंने अध्यापक न रखकर उपाचार्य के रूप में रख लिया। सभी उन्हें छोटे आचार्य कहने लगे।

आकर्षक गुण :

वे नम्र थे, सुशील थे, बहुत बड़े विद्वान् नहीं थे पुनरपि पर्याप्त विद्यावान् थे, स्वभाव से परोपकार प्रिय थे, छात्रों को अत्यन्त स्नेह करते थे, प्रत्येक कार्य को मनोयोग से करते थे. जिस किसी से एक अक्षर भी पढ लिया गुरु जी कहकर बोलते थे, स्वयं रक्त वस्त्रधारी होकर भी विद्वानों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते थे, वैदिक धर्म के दीवाने थे, महर्षि दयानन्द के भक्त थे, आर्यसमाज के प्रहरी थे, गुरुकुल विश्वभारती भैयापुर लाढ़ौत रोड़ रोहतक के लिए मरते और जीते थे। बालकों में बालक थे, साथियों के साथी थे, बड़ों के साथ गम्भीर थे, जिस किसी से मिलते थे हंसते हुए मिलते थे, शरीर से बहुत लम्बे नहीं परन्तु उनके संकल्प विशाल थे, कर्मठ इतने कि अहर्निश कार्य व्यस्त रहकर भी थकते नहीं थे, सम्पर्कशील इतने कि प्रातः से शाम तक फोन बजता ही रहता, मधुरभाषी इतने कि एक बार जिससे मिल लेते वह उनका हो जाता और पारस्परिक मिलन में सभी से स्वयं पहले बोलते थे।

समाज सुधार का प्रबल कार्य :

ग्रीष्मावकाश के दो दिन थे, दो तीन वर्ष पहले की बात है मेरे मन में आया कि क्यों न इन दिनों ग्रामों में नवयुवकों के शिविर लगा कर उन्हें आर्यसमाज में दीक्षित किया जाये। मैंने तुरन्त ही ब्रह्मचारी उदयवीर को बुलाया अपना विचार बताया तो उन्होंने कहा मैं तो स्वयं आपसे यह कहने वाला था- धर्मप्रचार का इससे सुनहरा और कौन सा अवसर हो सकता है गुरु जी। ‘शुभस्य शीघ्रम्’ कल का ही कार्यक्रम बनाते हैं, उन्होंने तुरन्त विचार को कार्य में परिणत कर दिया भैयापुर लाढ़ौत, बलियाना, किलोई, भालोठ, हुमायुंपुर, आहुलाना, सांघी और जसिया जैसे नौ ग्रामों में चरित्र निर्माण शिविर एक ही महीने में, प्रत्येक सप्ताह में तीन तीन, आज एक का समापन है, कल दूसरे का उद्घाटन है, इस प्रकार अहर्निश मेरी पुरानी बूढ़ी गाड़ी और मुझे भी व्यस्त बना दिया।

मेरे पास प्रायः कोई कार्य लेकर आते तो गुरुकुल का या अन्य कोई समाजहित का, मुझे कहते गुरु जी तथाऽस्तु कहो। मैं विचार कर तथाऽस्तु कह दिया करता था। मना करने पर कभी कोई कार्य नहीं किया। किसी कार्य को ज्यादा ही मना किया तो मुझसें आग्रहपूर्वक तथाऽस्तु कहलवा कर करते थे।

दूध की व्यवस्था :

गत वर्ष की बात, सायंकाल का समय भोजन की घंटी बज चुकी थी मेरा और उनका घी इकट्ठा ही रहता था। दैवयोग से घी समाप्त था, मेरा भोजनालय में जाना हो गया। ब्रह्मचारी उदयवीर भोजन कर रहे थे थाली में दाल थी, रोटी भी थी परन्तु बिना चुपड़ी।

“क्यों उदय सूखी रोटी खा रहे हो?”

“गुरु जी घी समाप्त है।”

“दूध तो समाप्त नहीं है दूध ही ले लेते।”

“गुरु जी दूध तो आप भी नहीं ले रहे।”

“मैं तो इसलिए नहीं लेता कि दूध कम है, जब ब्रह्मचारियों को ही पूरा नहीं मिलता तो में कैसे ले सकता हूँ?”

“तो गुरु जी मैं कैसे ले सकता हूँ?”

किमधिकेन, यह बात गौशाला व्यवस्थापक ओमवीर जी के पास पहुंची अगले ही दिन गोशाला में तीन गौवें और आ गई तथा ब्रह्मचारियों के लिए दूध की पूरी व्यवस्था हो गई।

अर्थ शुचिता :

जब उन्हें गुरुकुल में अध्यापक नियुक्त किया गया तो मैंने पूछा मासिक दक्षिणा क्या लिया करोगे ? उनका उत्तर सुनकर हृदय गद्गद् हो गया “गुरु जी वेतन लेना होता तो मैं अपने अन्य सहपाठियों की तरह सरकारी में ना चला गया होता क्या आर्य मुसाफिर पं० लेखराम को छोड़कर किसी वेतनभोगी ने देश की सच्ची सेवा की है? मेरी यह मोटरसाईकल और मैं आपको समर्पित हूं अहर्निश सेवा के लिये उपस्थित हूं। रूखा-सूखा जो पाकशाला में बनेगा मेरे लिये वही पर्याप्त है।”

यह पृथक् बात रही कि उनको खाने-पीने की पूरी छूट थी कोई फल, मेवा, दूध, घी, वस्त्र, पुस्तक या मिठाई के लिए मुझ से तथाऽस्तु कहलवाने की आवश्यकता नहीं थी।

रुपये, पैसे के लिए व्यवस्था थी कि गुरुकुल के कार्य हेतु प्रतिदिन उन्हें भी व्यय करना होता था और मुझें भी अलमारी में रुपयों के साथ एक बड़ा सा कागज रखा होता था। वे मुझ से चाबी लेकर आवश्यकतानुसार पैसा लेकर उसमें लिख दिया करते थे। में स्वयं लेता तो भी ऐसा ही करता। नियम था कि शाम को हिसाब देकर ही सोना है व्यय-पत्र या रसीदें सदा ही सही प्राप्त होती। गत पांच सात वर्षों में हमारी अलमारी के लेखे-जोखे में कभी फर्क नहीं मिला यह उनकी अर्थ शुचिता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

लोभ पर विजय :

एक बार उन्होंने मेरे सामने एक विशेष बात रखी, जिसका मुझे पूरा विश्वास तो नहीं, परन्तु विश्वास इसलिये करना पड़ा कि वह बात उनके एक निकट मित्र द्वारा रखी गई। शायद आपको भी विश्वास न हो गुरु जी ! भारतीय मूल का कोई विदेशी व्यक्ति एक सौ करोड़ का दान करना चाहता है। पहले वह एक करोड़ देगा आश्वस्त होने पर बाकी पैसे क्रमशः दो वर्ष में पूरे कर देगा लेकिन शर्त यह है कि 33 करोड़ के बदले 100 करोड़ की दान प्राप्ति रसीद देनी होगी। गुरु जी ! ऐसे स्वर्णिम अवसर का हम क्यों न लाभ उठायें। इस गुरुकुल को हम सोने का बना लेंगे, दूसरा कन्या गुरुकुल रोहतक में नहीं है बना लेंगे विस्तृत भूभाग खरीद लेंगे……….। मैंने उसे रोककर कहा- उदय इतनी ऊंची उड़ान मत भरो, धड़ाम से गिरोगे। क्या ऐसा करके हम देश के भ्रष्टतम व्यक्तियों में अग्रणी नहीं होंगे? हम में और अपराधियों में कोई अन्तर रह जायेगा क्या? अरे महर्षि दयानन्द ने सोने चांदी से भरी गाड़ी ठुकरा दी। हम उन्हीं के शिष्य हैं, ठुकरा दे इस पाप के पर्वत को।

सोने की लंका और लंकापति का क्या हुआ था जानते हो ? वही परिणाम गुरुकुल और हम संचालकों का देखना चाहते हो क्या ? इस प्रकार समझाने पर बात तुरन्त समझ में आ गई।

प्रगतिवादी विचारधारा :

विद्यालय भवन में पठन-पाठन का निरीक्षण कार्यालय में बैठे-बैठे भी हो सके इसके लिये सी.सी. टी.वी. कैमरे सभी कमरों लगाने का प्रस्ताव लेकर मेरे सामने उपस्थित हुए। आर्थिक परिस्थितियां सामने रखते हये कुछ समय रुकने की कही तो उन्होंने कहा कि गुरु जी आर्थिक कठिनाई तो रहेगी ही, आप ‘तथास्तु’ कहो सब हो जायेगा। मैंने कहा- ‘तथाऽस्तु’ और दो दिन में सब कमरों में सी.सी. टी.वी कैमरे लग गये।

— ऐसे कम्प्यूटर रूम में कम्प्यूटरों की कमी हो, विज्ञान भवन में वैज्ञानिक उपकरणों की कमी हो, कक्षाओं में स्मार्ट क्लास की व्यवस्था मुझे परिस्थिति अवगत करा ‘तथाऽस्तु’ कहलवा लेते थे। पैसा आते ही उपरोक्त सभी कार्य यथाशीघ्र हो जाया करते थे। गुरुकुल में उपरोक्त सभी व्यवस्था करने में उनका अपना विशेष योगदान है।

सामाजिक आन्दोलनों में अग्रणी :

आर्यसमाज की ओर से या अन्य सामाजिक संगठनों की ओर से जो भी आन्दोलन होता उसमें भाग ही नहीं लेते अपितु सिरधड़ की बाजी लगाकर अग्रणी रहते थे। उनका अपना ग्राम्य युवकों का संगठन होता था जो अवसरों पर उनके साथ देखा जाता था। फोन करते ही दस पन्द्रह युवक तुरन्त आ धमकते थे। युवक कोई और नहीं इस गुरुकुल के स्नातक होते थे, चाहे कसाइयों से गौवें छुड़वानी हो चाहे इन्द्रप्रस्थ गुरुकुल की भूमि मुक्त करानी हो, चाहे स्वामी रामदेव का अनशन हो, चाहे अन्ना हजारे का सत्याग्रह और चाहे आर्यसमाज का संस्कृत आन्दोलन हो या रामपाल दास के पाखण्ड-गढ़ को तोड़ने का कार्य हो, उदयवीर रूपी रामप्रसाद बिस्मिल का वह स्नातक मण्डल या क्रान्तिदल अपने नेता के साथ खड़ा मिलता।

अमर बलिदान

देश का दुर्भाग्य है कि स्वतंत्रता के पश्चात् अनेक मतमतान्तर, अनेक धर्माचार्य, अनेक धर्मगुरु और नये-नये भगवानों की बरसाती मेंढकों के समान बाढ़ सी आ गई। ये भगवान् आधुनिक संसाधनों द्वारा आंख के अन्धे गांठ के पूरे लोगों को विविध प्रकार से बहला-फुसला कर अपना-अपना अनुयायी बनाकर लूटते हैं, लूटते ही नहीं अन्य अनेकविध अकथनीय अनैतिक कुकर्म भी करते थे।

ऐसा ही एक पाखण्ड और अनैतिक कर्मों का अड्डा रोहतक से कुछ ही किलोमीटर करौंथा गांव में रामपाल दास नामक किसी व्यक्ति का है। जो महर्षि दयानन्द ही नहीं अन्य धर्मशास्त्रों और महापुरुषों पर विविध लांछन लगाता है। जिसके बारे में लिखना पिष्ट पेषण ही होगा। उसके साथ चल रहे आर्यसमाज के लम्बे आंदोलन की कहानी चारों ओर के सभी ग्रामों की जनता पूर्णतः जानती है।

12 मई को पुनः उस आश्रम को खाली कराने के लिए आर्यसमाज और क्षेत्रीय ग्राम ने संयुक्त आन्दोलन प्रारम्भ किया आर्यसमाज के नेतृत्व में आरपार की लडाई की घोषणा की गई। जिस आर्यसमाज को सरकार मतप्राय और अक्षम मानती थी, उसकी ललकार पर आचार्य बलदेव के नेतृत्व में लाखों लोग उस पाखण्ड गढ़ के विरोध में सड़क पर उतर आये। ऐसे अवसर को ब्रह्मचारी उदयवीर कैसे हाथ से जाने देते। वे भी मुझ से तथाऽस्तु कहलवा कर सारा काम छोड़कर स्नान करके बड़े चाव के साथ निकल पड़े जैसे बाराती बारात में खुश होकर चढ़ रहा हो।

करौंथा गांव के सामने सड़क का दृश्य बड़ा ही लोमहर्षक था। पुलिस और सेना कई हजार की संख्या में थी। मानो यह कोई युद्ध भूमि हो और दो देशों की सेनायें परस्पर युद्ध कर रही हों। प्रशासन ने भी आंदोलन को कुचलने के लिये सख्त आदेश दिये हुये थे। इस बात का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस की ओर से भी जनता पर पथराव के जवाब में दिनभर गोलियां चलती रही। दो आन्दोलनकारी शहीद हो गये थे। अन्य अनेक गोलियों के शिकार होकर मैडिकल में मौत से लड़ रहे थे। स्वतन्त्रता के बाद अपनी ही सरकार द्वारा वह भी मुख्यमंत्री के गृह जिले में ऐसा नर-संहार, गोली चलाने की ऐसी खुली छूट सरकार के मनोरथ को स्पष्ट कर रही थी। मैंने ब्रह्मचारी उदयवीर को समझाया कि हालात बड़े खराब हैं। बड़ी सावधानी की आवश्यकता है।

यहाँ मैं इतना और बता दूं ब्रह्मचारी उदयवीर में जहाँ अन्य अनेक गुण थे वहाँ एक विशेष गुण शीघ्रकारिता का था। यह गुण कभी-कभी अवगुण भी हो जाता है। यदि कार्य से पहले सारी परिस्थितियों को देखकर पूरी तरह विचार नहीं किया जाये और आप्त पुरुषों से विचार विमर्श नहीं किया जाये तो। उन्होंने तो तुरन्त ही पुलिसरूपी आग में छलांग लगा दी और हरयाणा सरकार की बर्बर पुलिस के किसी निर्दय सिपाही की गोली के शिकार हो गये। गोली शरीर को फाड़ती हुई पार हो गई। वे तुरन्त धराशायी हो गये। पुलिस ने इस प्रकार बेरहमी से उस देशभक्त साधु पर गोली चलाई जैसे अंग्रेज सरकार देशभक्तों पर चलाती थी। पुलिस उन्हें तुरन्त उठा ले गई। यह घटना दिन के छः बजे की है। लेकिन शाम के नौ बजे उन्हें झज्जर सिविल हस्पताल पहुंचाया जाता है। यह भी एक रहस्य है जिस पर से आज तक पर्दा नहीं उठा है। और शायद इस आर्य मुख्यमंत्री से हम न्याय की आशा कर भी नहीं सकते। जिस पर हम बड़ी-बड़ी आशायें बांधे बैठे थे, वह धर्मवीर, वह देश का दीवाना, आर्यसमाज का प्रहरी, उदयवीर, कुल 31 वर्ष की आयु में, जिसका अभी कार्यक्षेत्र में उदय ही हुआ था, उसका 12 मई 2013 को क्रूर हाथों ने अन्त कर दिया। आन्दोलन ने और अधिक उग्र रूप धारण कर लिया, हर किसी के दुःख, शोक और आक्रोश की कोई सीमा न रही चार दिन तक शव मैडिकल के शवगृह से हमने नहीं लिया। प्रशासन की ओर से पूरा दबाव बनाया गया कि दाह संस्कार कर दिया जाये, जिससे आन्दोलन में जान न रहे। 16 मई को प्रशासन ने एक प्रकार से हार मान ली और पाखण्ड का गढ़ (जिसमें लगभग छः, सात हजार के लगभग सशस्त्र व्यक्ति लाकर भरे हुए थे) पूर्णतः शाम चार बजे तक खाली करा दिया तथा ताला लगा दिया।

सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान आचार्य बलदेव ने आन्दोलन को समाप्त करने की घोषणा की और कहा इन दोनों वीर शहीदों का दाह संस्कार कर दिया जाये।

विशाल शवयात्रा :

17 मई प्रातः 9 बजे रोहतक शवगृह से पोस्टमार्टम करा के ब्रह्मचारी उदयवीर का पार्थिव शरीर लेने के लिये हजारों की संख्या में आर्यजन एकत्र थे। शवयात्रा रोहतक से दिल्ली रोड़ होते हुए बलियाना गाँव ब्रह्मचारी उदयवीर की जन्मभूमि के लिए ग्रामवासियों के दर्शनार्थ आगे बढ़ी जैसे-जैसे शवयात्रा आगे बढ़ती गई परस्पर सूचना पाकर शामिल होने वालों की संख्या बढ़ती गई। गुरुकुल के ब्रह्मचारी और हम सब गुरुकुल के अधिकारी अध्यापक शवयात्रा में सर्वाग्रणी थे। जहां लोगों में शोक था वहां इस वीर शहीद के बलिदान से सारे जनसमूह की भावना से प्रकट हो रहा था कि देखो शहीद होकर यह नवयुवक साधु हम सबको पीछे छोड़ गया कैसी अपूर्व गौरवमय वीरगति इस जवान को प्राप्त हुई। जनसमूह में नारे लगाये जा रहे थे ब्रह्मचारी उदयवीर अमर रहे, उपाचार्य उदयवीर अमर रहे, जब तक सूरज चांद रहेगा-उदयवीर तेरा नाम रहेगा, जब तक आर्यसमाज रहेगा उदयवीर का नाम रहेगा।

हर्ष और शोक मिश्रित यह विचित्र शवयात्रा पन्द्रह बीस मिनट जन्मभूमि के द्वार पर रुकी, पश्चात् बलियाना की गलियों से होती हुई गुरुकुल भैयापुर लाड़ौत जो उनको मातृ संस्था थी, जो उनकी कर्मभूमि थी के लिये चल पडी। यहां आकर हमने अभूतपूर्व दृश्य देखा शवयात्रा से दुगुनी संख्या में जनता गुरुकुल में प्रतीक्षा कर रही थी पूरा गुरुकुल श्रद्धालुओं से खचाखच भरा था। ओह ! कितना मान दिया जनता ने उन्हें तुरन्त स्नानादि क्रियायें करके गुरुकुल के उत्तरी भाग में खाली पड़े भूभाग में दाह संस्कार की तैयारी की गई। पन्द्रह पीपे देशी घी, कई बोरी हवन सामग्री, चन्दन की लकड़ी आदि सभी कुछ गुरुकुल ने व कुछ अन्य श्रद्धालुओं ने एकत्र किया। आचार्य बलदेव, आचार्य हरिदत्त, स्वामी आर्यवेश, स्वामी देवव्रत, आचार्य सत्यानन्द नैष्ठिक आदि साधुओं ने मुखाग्नि दी। सभी अन्य प्रतिष्ठित आर्यगण भी भीगी आंखों से साथ खड़े थे। इधर आहुतियां पाकर जैसे-जैसे अग्नि बढ़ने लगी, उधर जनता की आंखों से अश्रुधारा बह चली। अग्निदेव ने अग्निवर्ण रक्त वस्त्रधारी वीर मां के वीर सपूत उस सच्चे साधु को धीरे-धीरे आत्मसात कर लिया। विवर्ण मुख सभी लौट पड़े मानो आज सभी का सब कुछ छिन गया हो।

वे इस धर्मयुद्ध में अपने को स्वाहा करकै अमर हो गये। जब तक आर्यसमाज रहेगा उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में अमर रहेगा।

  • साभारआचार्य हरिदत्त जी