बिना बुलाए”धर्मवीर”इन, चार घरों पर जाता है।
बिना बुलाए”धर्मवीर”इन,
चार घरों पर जाता है।
दुख में सुख में साथ रहे जो,
सच्चा मित्र कहाता है।
पालन पोषण करे जो स्वामी,
जन्म जहां पर पाता है।
अंधकार को मिटा गुरु जो,
सच्चा मार्ग बताता है।
जो जन रणभूमि में जाकर,
पीठ नहीं दिखलाते हैं।
पर पुरुषों की नारि नहीं,
जो खोटी नजर लखाते हैं।
जिसके द्वार से भिक्षुक खाली,
लौट कभी ना जाते हैं।
“धर्मी”ऐसे महापुरुष तो,
कहीं-कहीं पर पाते हैं।
कौन भला वस्तु ऐसी जो,
आग जला ना पाती है।
कौन भला वस्तु ऐसी जो,
सेतु समा ना जाती है।
कौन भला देहधारी ऐसा,
मौत जिसे ना खाती है।
कौन भला त्रिया ऐसी,
जो कभी ना जाल रचाती है।
व्यभिचारी की संगत पाकार,
सन्यासी मिट जाता है।
मुर्ख मंत्री रखकर राजा,
अपना नाश कराता है।
अहंकार के करने वाला,
ना कोई गुणी कहाता है।
मद्य मांस का सेवन हारा,
मान कहीं ना पता है।










