बिन आत्मज्ञान के दुनिया में

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बिन आत्मज्ञान के दुनिया में

बिन आत्मज्ञान के दुनिया में,
इंसान भटकते देखे हैं।
आम बशर की तो बात ही क्या,
सुलतान भटकते देखे हैं॥

जो सबरों सकूं की दौलत है,
मिलती है आत्मज्ञानी को।
तसकीन को तो देखा है,
धनवान् भटकते देखे हैं ॥

सब ज्ञान तो उसने सीख लिया,
पर आत्मज्ञान ही सिखा ना।
यही कारण है कि पण्डित भी,
अनजान भटकते देखे हैं॥

जो भटकाते हैं दुनियाँ को,
वे आप भटकते देखे हैं।
गुणवान् भटकते देखे हैं,
साइंसदान भटकते देखे हैं।॥

अज्ञान के कारण देहधारी,
मानव को ही ईश्वर मान लिया।
अब जाने माने लोगों के,
भगवान् भटकते देखे हैं॥

जिस महफिल में देखा है,
हर एक को भटकता पाया है।
हर मेम्बर की तो बात ही क्या
प्रधान भटकते देखे हैं॥

जो आत्मज्ञानी होता है,
बलवान् है सारी दुनियाँ में।
वैसे तो ‘पथिक’ इस दुनियाँ में,
बलवान् भटकते देखे हैं॥