बिगड़ी बनाने वाले बिगड़ी मेरी बना दे।

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पार तू लगा दे (तर्जओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले)

बिगड़ी बनाने वाले
बिगड़ी मेरी बना दे।
मंझधार में है नैय्या
उस पार तू लगा दे।।

१. चारों तरफ पिता जी
छाया हुआ अंधेरा,
राह से भटक गया हूँ
इक आसरा है तेरा।
अंधकार में पड़ा हूँ
प्रकाश अब दिखादे ।।

२. विषयों में फंस के मैंने
आयु के दिन गुजारे,
खा खा के ठोकरें
अब आया हूँ तेरे द्वारे।
गोदी में ले बिठा
तू चाहे मुझे सजा दे।।

३. ‘नंदलाल’ आयु सारी
वृथा यूंही गुजारी,
संगत बुरी से मेरी
बुद्धि गई है मारी।
मन के मंदिर में फिर से
ज्योति प्रभु जगा दे।।

भरे ही को भरती है,
दुनियाँ मदाम।
समुन्दर को चाहते हैं,
दरिया तमाम ।।