भरा प्रेम से प्रभु का मन खिला सृष्टि रूप सुमन
भरा प्रेम से प्रभु का मन
खिला सृष्टि रूप सुमन
ना हुआ प्रभु को चैन
जाग उठा प्रभु का प्रेम
सारी सृष्टि घड़ी अनुपम
यह अद्भुत करुणा-स्रोत था किसका
गुण, कर्म, स्वभाव था प्रभु का
भरा प्रेम से प्रभु का मन
खिला सृष्टि रूप सुमन
प्रेम से ही सृष्टि का प्रभु करें प्रजन
क्रोध द्वेष ईर्ष्या से होवे ना सृजन
बरस पड़ा है स्नेह मेघ-सिन्धु बन
अणु-अणु, कण-कण में
मस्ती भरा गायन
किया नाद ने संगीत-रूप धारण
बना ताल के अनुपात का साधन
तालमय संगीत गान
ईश का ही धन
यह अद्भुत करुणा-स्रोत था किसका
गुण, कर्म, स्वभाव था प्रभु का
भरा प्रेम से प्रभु का मन
खिला सृष्टि रूप सुमन
चेतना का शिखर है भावना रोमांचक
ठाठें समुद्र की हैं, मेघ बने गर्जक
मीठे वायु के झरोखे हैं देखो सन सन
प्रकृति प्रभु का कर रही है आलिंगन
मानव के सर्जन में रहे प्रेम धारण
भावना की उपज ही कलाओं का कारण
चित्र, संगीत, काव्य में है प्रेम-रङ्ग
यह अद्भुत करुणा-स्रोत था किसका
गुण, कर्म, स्वभाव था प्रभु का
भरा प्रेम से प्रभु का मन
खिला सृष्टि रूप सुमन
होते हैं रोमांचित भावना के रङ्ग
यही तो अमर कृति लाती है रङ्ग
ब्रह्मज्ञानी तो हैं कलाकार ब्राह्मण
बनियों की भान्ति नहीं है वो कृपण
आत्मोत्सर्ग से होता है सर्जन
जिससे मानव बने सर्वोत्तम
स्नेह में प्रभु के, झूमते हैं सन्त
यह अद्भुत करुणा-स्रोत था किसका
गुण, कर्म, स्वभाव था प्रभु का
भरा प्रेम से प्रभु का मन
खिला सृष्टि रूप सुमन
ना हुआ प्रभु को चैन
जाग उठा प्रभु का प्रेम
सृष्टि घड़ी अनुपम
यह अद्भुत करुणा-स्रोत था किसका
गुण, कर्म, स्वभाव था प्रभु का
भरा प्रेम से प्रभु का मन
खिला सृष्टि रूप सुमन
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * २०.११.२००५ ११.३५ रात्रि
राग :- शुद्ध बिलावल
गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा
शीर्षक :- प्रेम – पारावार
वैदिक भजन ८८५वां
*तर्ज :- *
827-0228
सुमन = अच्छा मन
प्रजन = जनक, जन्म देने वाला
सृजन = निर्माण करने वाला
अनुपात = एक दूसरे का सम्बन्ध
कृपण = कंजूस
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
प्रेम – पारावार
यह सृष्टि प्रभु के प्यार की है। प्रभु को अकेले चैन नहीं पड़ती थी। वह करुणा का स्रोत करुणा किसे दिखाता? वह प्रेम का पुतला प्रेम कैसे करता? उसके स्वभाव में सृष्टि करना था। उसका यह स्वभाव सफल कैसे होता?
सच तो यह है कि सृष्टि सभी प्रेम ही की उपज होती है। द्वेष से, क्रोध से, ईर्ष्या से विनाश ही होता है। निर्माण प्रीति से, स्नेह से, चाव से ही हो सकता है।
प्रभु का स्नेह समुद्र बनकर उमड़ा, मेघ बनकर बरसा, नाद बनकर गर्। मेघ से आर्द्रता लेकर कण-कण में स्फूर्ति आई। नाद ने संगीत रूप धारण किया और उसका ताल तत्वों का पारस्परिक अनुपात हो गया।
आज संसार में नृत्य गान है। ताल है,लय है। यह प्रभु के उसी संगीतमय प्रेम का फल है।
चेतना की चोटी है भावना–इमोशन।
बाहर रोमांच में प्रकट होती है। विश्व रोमांचित है। उसमें भावना उमड़ रही है।
कहीं समुद्र ठाठें मार रहा है, कहीं में घूम की गर्जन है, कहीं वायु के झकोरे हैं। कहीं कल-कल बहती नदियों की उमंग है।
प्रकृति प्रभु के आलिंगन में मस्त हो होकर नाच रही है।
इसी के परिणाम स्वरुप, मनुष्य भी जब निर्माण करता है तो प्यार के द्वारा। कल आएं सब भावना की उपज हैं। संगीत चित्र कविता आदि सब प्यार ही के कारण हो पाते हैं। मनुष्य भावना से अभिभूत होता–उसका अंग-अंग रोमांचित हो उठता है, तभी उससे कोई अमर कृति हो पाती है। कलाकार ब्राह्मण से, पाई-पाई का हिसाब रखने वाले बनिए नहीं। उन्होंने आत्मोसर्ग किया था जैसे प्रभु ने। मतवाले प्यार से, झूम- झूम कर बेसुध हो जाने वाले दुलार से।
885वां वैदिक भजन🕉👏🏽










