भज ले ओंकार रे मन मूर्ख अनारी।

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भज ले ओंकार रे मन मूर्ख अनारी।

भज ले ओंकार रे मन मूर्ख अनारी।
चार दिनन के जीवन
खातिर कैसा जाल पसारी।
कोई न जावत संग तुम्हारे,
मात-पिता, सुत-नारी।।

पाप कपट से संचित कर धन,
मूर्ख मौत बिसारी।
ब्रह्मानन्द जन्म यह दुर्लभ
देत वृथा किम डारी ।।