भगवान् तेरी महिमा, क्या अजब निराली है
भगवान् तेरी महिमा
क्या अजब निराली है
इक घर में अँधेरा है
इक घर में दिवाली है
क्या अजब तमाशा है
क्या खेल रचाया है
यह खेल तेरा दाता
कोई जान न पाया है
अरबों का वाली है
पर गोद से खाली है
कोई इतना सुन्दर है
फूलों से सजाते है
कवि भी कविता कर के
गुण रूप के गाते है
कूरूप कोई इतना
जैसे रजनी काली है
तकदीर की हलचल है
या कर्म का पाशा है
दर दर का भिखारी है
एक हाथ में काशा है
भर पेट नहीं मिलता
भोजन का सवाली है
संसार पहेली है
उलझन ही उलझन है
“बेमोल” ये रिश्तों का
यहाँ कैसा बन्धन है
कुछ दिन के लिए हमने
इक दुनिया बसा ली है
भगवान् तेरी महिमा
क्या अजब निराली है
इक घर में अँधेरा है
इक घर में दिवाली है










