भगवान् की रचना
(तर्ज – मेरे देश की धरती सोना उगले)
भगवान् की रचना बड़ी निराली
बड़ी ही सुन्दर न्यारी।
भगवान् की रचना………
१. कितनी अद्भुत रचना उसकी
इनसान कभी न जान सका।
कोई रंग रूप चेहरा उसका
अब तक न कोई पहचान सका।
वो अनादि अनन्त अनश्वर है
सब ने जिसका गुणगान किया।
उस निराकार परमेश्वर ने
साकार जगत निर्माण किया।
भगवान् की रचना….
२. देखो तो ज़रा इस दुनियाँ में
क्या क्या करतब दिखलाये हैं।
कहीं नदियाँ हैं कहीं पर्बत हैं
कहीं जंगल घने बनाये हैं।
सूखा है कहीं हरयाल कहीं खण्डर हैं
कहीं मैदान कहीं। रंग रंग के खिले हैं
फूल कहीं वृक्षों पे फलों की शान कहीं।
भगवान् की रचना………
३. ऋतुओं का चले चक्कर ऐसा
हर एक समय पर आती है।
कभी गर्मी है कभी सर्दी है
कभी वर्षा रंग दिखाती है।
सूरज और चाँद बना कर के,
क्या सुन्दर दीप जलाये हैं।
धरती नभ अग्नि जल वायु
अनमोल रत्न उपजाए हैं।
भगवान् की रचना………..
४. जलचर थलचर नभचर जितने
सब का निर्माण किया उसने।
जीवों को कर्म करने के लिये
यह शरीर और प्राण दिया उसने।
इक सब से विशेष बना डाला है
दिया बुद्धि और ज्ञान जिसे ।
सब प्राणियों का सरताज है
यह कहते हैं ‘पथिक’ इनसान जिसे।
भगवान की रचना………










