भगवान के दान की निन्दा मत करो मा निंन्दत् य इमां मह्यं रा॒तिं दे॒वो दुदौ मर्त्याय स्व॒धावा॑न् ।
पावा॑य॒ गृत्सौ अमृतो विचैता वैश्वानरो नृत॑मो य॒वो अ॒ग्निः ।। ऋ. ४.५.२
तर्जः प्रिया आज आले
किसके लिये है ये सारा जहान, दान प्रभु का है निष्काम
उपकार कैसा है महान !
॥किसके लिए॥
किसी उपकार के बदले, नहीं दी है सृष्टि (2)
कोई ना अपेक्षा रखे, रखे कृपा दृष्टि (2)
पोषक वो पालक शक्तिमान, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
॥किसके लिए॥
मूर्ख, विद्वान, हो निर्बल या अधम या पापी, (2)
प्रजा, राजा धनी दरिद्र हो बली या घाती, (2)
प्रभु सबके रक्षक सब के प्राण, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
॥किसके लिए॥
रचित सृष्टि का प्रयोजन जीव बढ़े आगे, (2)
उन्नति प्रयत्न करे तो सौभाग्य जागे, (2)
अग्निरूप अग्रणी भगवान, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
॥किसके लिए॥
मरणधर्मा हूँ जाने कब दुनियाँ से जाऊँ (2)
जाने कब करा दे अमृतपान, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
पर तुझको तो अमृतमय अविनाशी पाऊँ (2)
॥किसके लिए॥
अपक्व जीवन के कारण अशुद्ध बना हूँ (2)
तेरा दान पाये बिना प्रबुद्ध कहाँ हूँ? (2)
तेरे दान में है कल्याण, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
॥किसके लिए॥
पिताओं में श्रेष्ठ पिता हैं, भाईयों का भाई (2)
जितने भी रिश्ते, सबमें दाता दे दिखाई (2)
वैश्वानर है वो महान, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
॥किसके लिए॥
सर्वहितकारी गुरु वो देता विविध दान (2)
दान के निन्दक तो है कृतघ्न या नादान (2)
बात उनकी पे ना दूँ कान, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
॥किसके लिए॥
बिना मूल्य के आजीवन, प्रभु देता रहता दान (2)
दान की करो ना निन्दा सदा करो सम्मान (2)
स्तुति करो तुम अविराम, शत शत प्रभु को है प्रणाम !
॥किसके लिए॥
(अथम) नीच। (अग्रणी) आगे ले जाने वाला। (घाती) मारने वाला। (वैश्वानर) सब
मनुष्यों का हितैषी। (अपक्व) कच्चा। (प्रबुद्ध) ज्ञानी।










