भगवान का भला रूप

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यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे ।

प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शंसिषम् ।।

साम. ३५ ऋ. ६.४८.१

तर्जः मरनित्यु मिन्दिनो मनसिल तुडुम्बुम्बो

जब से रहस्य जाना, यज्ञ का हमने, जीवन बना यज्ञमय पावन
यूँ तो अन्जाने में हर अङ्ग है याज्ञिक
कर रहे हैं मिलजुल कर संगतिकरण
मन देह इन्द्रियाँ हैं अग्नि-अर्पण ॥
श्वास लेना आँख झपकना, रुधिर प्रवाहित होना,
यह सब तो छोटे-छोटे नित यज्ञ हैं।
अंग-प्रत्यंग मिलकर, क्रियाओं में भाग लेते,
यज्ञ द्वारा अभिलक्षित ये अनवद्य हैं,
मन देह इन्द्रियाँ यज्ञ हेतु भाग लेके, (2) कहते इदमग्नये-इदन्नमम्॥
॥ जब से रहस्य ॥

सबसे बड़ा याग है, विश्व का याग,
परमेश्वर का जिसमें एकछत्र राज है,
इतने बड़े विश्व में, गिनती क्या मनुष्य की ?
कितना मनुष्य का अल्पभाग है,
विश्व याग-आग में कोई जाने ना जाने (2)
नन्हीं आहुति का मूल्य जाने भगवन्
॥ जब से रहस्य ॥

प्रभु ने ही यज्ञ रचाया यजमान बनके,
विश्व-याग-देवता हम हैं इस यज्ञ के।
प्रभु चाहते देवता आहुति देवें यज्ञ में,
इसीलिए विश्व-यज्ञ रचा है सर्वज्ञ ने।
यज्ञ में किया गया उपदान मूल्य रखता है (2)
भला करता है प्रभु-भक्त का भजन
॥ जब से रहस्य

सफल होगा आहुति से, प्रभु का अखण्ड यज्ञ
भावनाओं में होगा व्यवहार सत्य
वाचिक मानसिक कायिक आहुतियाँ यज्ञमय
बना देंगे अग्निदेव कल्याणकारी नित्य
व्यष्टि-समष्टि में हवियों की चिर चमक (2)
जातवेदस् अग्नि बने मित्र मनभावन॥
॥ जब से रहस्य ॥

आओ उठायें ज्वाला, जातवेदस् अग्नि की,
गाते जायें स्तुतियाँ देव अग्रणी की
वाणी आचरण विचार से बन जायें उज्ज्वल,
मनहर सुगन्ध फैले इस अग्नि की
कर देवें पूर्णाहुत हविरूप जीवन को (2)
जागे देव पूजा दान संगतिकरण॥
॥ जब से रहस्य ॥

(संगतिकरण) परस्पर मेल करना। (रूबिर) रक्त, खून। (इदन्नमम) यह मेरा नहीं है।
(सर्वज्ञ) सब कुछ जानने वाला। (उपदान) भेंट। (वाचिक) वाणी सम्बन्धी। (मानसिक)
मन सम्बन्धी। (कायिक) शरीर सम्बन्धी। (व्यष्टि) समाज में से प्रत्येक। (समष्टि) समस्त, सबका समूह।
(जातवेदस) जीवन की अग्नि। (अग्रणी) आगे ले जाने वाला। (हवि) आहुति।