बीहड़ वन में विचर रहा था

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बीहड़ वन में विचर रहा था

बीहड़ वन में विचर रहा था
सच्चे शिव का मतवाला।
छोड़ दिया टंकारा ।।

सुनी जमाने ने ना
उसकी क्या थी दर्द कहानी,
जान-बूझ कर कर उन
लोगों ने एक न उसकी मानी
काँच पीसकर दूध में डाला,
ऊपर जहर मिला डारा ।।

फूट-फूट कर हर इक
नस से शीशा ऊपर आया,
फिर भी खिला हुआ था
चेहरा जरा नहीं मुरझाया।
ईश्वर इच्छा पूरण होवे तू
ही मेरा प्रीतम प्यारा।।

कहा ऋषि से भक्तों ने
कोई पीछे याद बनाएं सुन
कर भक्तों की वाणी को
ऋषिवर झट मुस्काए ।
वहीं चलाना चाहते हो पूजा,
चाहता मैं जिससे छुटकारा ।।

वैदिक रीति से दाह करना
देह मेरी जल जाए,
मैं चाहता हूं राख भी
मेरी काम किसी के आए।
राख उठा खेती में डालो,
प्रेम ये जाने जग सारा ।।

परहित में जीवन दे डारा
सच्ची बात यही है,
दुनियां के विद्वानों ने
भी यह ही बात कही है।
मानव पर उपकार घनेरे
सबकी आंखों का तारा।।