सच्चे शिव का मतवाला
बीहड़ वन में विचर रहा था
सच्चे शिव का मतवाला,
छोड़ दिया था टंकारा…….
सुनी जमाने ने न उसकी,
क्या थी दर्द कहानी
जानबूझ कर हम लोगों ने,
बात न उसकी मानी,
हाँ बात……..
काँच पीसकर दूध में डाला,
उसमें जहर मिला डाला,
छोड़ दिया…………
फूट फूट कर हर इक नस से
शीशा ऊपर आया
फिर भी खिला हुआ था चेहरा,
जरा नहीं मुरझाया,
हाँ जरा……..
ईश्वर इच्छा पूर्ण होवे,
तू ही मेरा प्रीतम प्यारा,
छोड़ दिया………..
कहा ऋषि से भक्तों ने कोई,
पीछे याद बनायें,
सुनकर भक्तों की बातों को,
ऋषिवर झट मुस्काये
हाँ ऋषिवर……….
वही बनाना चाहते हो तुम,
जिससे चाहता मैं छुटकारा।
छोड़ दिया………
वैदिक रीति से दाह करना,
देह मेरी जल जाये
राख मेरी को मैं चाहता हूँ,
काम किसी के आये
हाँ काम ……..
राख डाल दो मेरी खेती में,
प्रेमी जाने जग सारा।
छोड़ दिया………
तारे गिनों नहीं, स्वयं तारा बनो। – आचार्य चन्द्रशेखर










