बयां करता अभिमान ओ भोले भैय्या दो

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बयां करता अभिमान ओ भोले भैय्या दो

बयों करता अभिमान ओ भोले
भैय्या दो दिन का मेहमान

आयु जैसे बढ़ती जाये खुशीयाँ
सारी घटती जायें माटी तन
पर क्यों ईत्तराये ॥१॥

समझले छाया सी माया को और
सुन्दर सी इस काया को साथ
रही है ये किसके सदा को ॥१॥

गाडे झण्डे इस जग अन्दर
कहाँ है रावण कहाँ सिकन्दर
तेरी हस्ती कुछ ना सुरेन्दर ॥३॥