बात-बात पर क्रोध करे
बात-बात पर क्रोध करे,
नित कड़वे वचन सुनता है।
दरिद्रता का स्वामी है,
निज घर में बैर बढ़ता है।
नीचों का नित संग करे,
कुलहीन की सेवा ठाता है।
“धर्मवीर”ऐसा नर निश्चय,
नरक कुंड में जाता है।
धर्मवीर भोजन से पहले,
जो सज्जन नित दान करे।
बाल,वृद्ध और तरुण सभी संग,
अपना मधुर बखान करे।
जैसे जितना कर सकता हो,
सज्जन का सम्मान करे।
गुरुदेव की सेवा ठावे,
निश्चित स्वर्ग पयान करे।
कुग्राम में जिसका बासा हो,
कुलहीन की सेवा नित ठावे।
नित रुखा सुखा भोजन हो,
त्रिया भी उलटी बतलावे।
एकलौता पुत्र महामूर्ख,
घर कन्या विधवा दुख पावे।
यह छैओं”धर्मी”जिसके हों,
बिन पावक के ही जर जावे।
कूप नदी का जल सुंदर भी,
मेघ सामान नहीं होता
हो बली आत्मिक जग कोई,
उस सम बलवान नहीं होता।
नेत्रों से बढ़कर के जग में,
कोई तेज महान नहीं होता।
भारत सम”धर्मी”बढ़कर के,
जर्मन जापान नहीं होता।










