बैठा है रथ में सारथी, अश्वों को करता काबू
बैठा है रथ में सारथी
अश्वों को करता काबू
चाहे जहाँ ले जाए
चाहे सठी सुधी या साधु
अश्वों की बागडोरों
से अश्व हैं अनियंत्रित
इच्छा अनुसार संयत
करता है मन प्रतिष्ठित
अन्तरात्मा रूपी सूरज
किरणें बनी है साथी
मानो देव बैठा संयमी
करता है रथ को काबू
बैठा है रथ में सारथी
बैठा जो देव अन्दर
करे बाह्य जगत को याज्ञिक
मन की संकल्प-महिमा
ना रश्मियाँ हैं बाधक
और ज्ञान-कर्म इन्द्रियों के
हैं अश्व ईश-आराधित
मन हाँके जहाँ वो चाहे
हर कर्म ऋत पे लागू
बैठा है रथ में सारथी
तुम कर लो बहुदृश्वन्
सब इन्द्रियरूप कृतुपशु
सारथी कुशल मनायु
वश कर ले पञ्चशत्रु
मनोवृतियाँ हो जाएँ
संकल्पों से ही जितशत्रु
सब इन्द्रियाँ सुरस हों
मनोदेव हैं जिनके चारू
बैठा है रथ में सारथी
बस बात इतनी केवल
मनोवृत्तियाँ संभालो
मन के संकल्प दृढ़ हों
रवि रश्मियाँ जगा लो
इन्द्रिय को वश में कर लो
आत्मा है “ललित” रासु
ईश्वर से जो मिला दे
ऐसा है वो महाबाहु
बैठा है रथ में सारथी
अश्वों को करता काबू
चाहे जहाँ ले जाए
चाहे सठी सुधी या साधु
बैठा है रथ में सारथी










