बहुत हुऐ नाकाम काटों से दामन

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बहुत हुऐ नाकाम काटों से दामन

बहुत हुऐ नाकाम
काटों से दामन
अपना फंसाके,
ख्वाबों की दुनियां
का ऐसा नगर है,
जिसकी ना मंजिल
कोई अंधी डगर है,
अंधी डगर है यह
ऐसा सफर है,
रस्ते में हो जाये
शामकई ना देखा
चलके चलाके।।१।।

लोग यहां पे कितने
मुखोटे लगाते है मन
से है काले पर तन को
सजाते है तन को
सजाते है मन को
रुलाते है वश में नही
है लगाम इन्द्रियो के
घोडे चले दौडाके ।। २।।

बडी ही संजीली है
व्यसनो की राहे जरा
पास जाओ तो पकड
लेती बाहें पकड लेती
बाहे बडा ही नचाऐ
अच्छा नही अन्जाम
सुरेन्द्र रहना बचके बचाके।। ३।।