बहे सत्संग की गंगा, अरे मन चल नहा आएं।

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सत्संग

बहे सत्संग की गंगा,
अरे मन चल नहा आएं।
बुझी ज्योति जो जीवन की,
उसे फिर से जगा आएं।।

यही बेला है कर ले पान,
प्यारे ज्ञान अमृत का।
लगा है धर्म का मेला,
अरे मन चल दिखा आएं।।
बहे सत्संग की गंगा, अरे मन……

तू ही योद्धा तू ही योगी,
तू ही है रूप संतों का।
जिसे तू भूल बैठा है,
उसे फिर से दिखा लाएं।।
बहे सत्संग की गंगा, अरे मन……..

भटकता फिर रहा दर-दर,
धराया नाम क्यों चंचल।
करे विश्वास जग तेरा,
तुझे ऐसा बना लाएं।।
बहे सत्संग की गंगा, अरे मन…….

ये सिक्के सोने चांदी के,
इसी दुनियां में चलते हैं,
चले परलोक में सिक्का,
कुछ ऐसा धन कमा लाएं।।
वहे सत्संग की गंगा, अरे मन……..

प्रभु के नाम का सिमरन,
जो हर इक मन को हर्षाए,
उसी के नाम की ज्योति,
हर दिल में जगा आएं।।
बहे सत्संग की गंगा, अरे मन…….

ये सन्तों का समागम है,
बड़ी मुश्किल से मिलता है,
बहे जहाँ ज्ञान की धारा,
चलो चल कर नहा आएं।।
बहे सत्संग की गंगा, अरे मन…….