बदला तो ऐसे बदला रङ्ग-रूप इस जहाँ का

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बदला तो ऐसे बदला रङ्ग-रूप इस जहाँ का

बदला तो ऐसे बदला
रङ्ग-रूप इस जहाँ का
हे सोम ! देवता मेरे
सब माँगे सोमरस तेरा

हे अजित! हे सोमदेव !
चाहते हैं रस तेरा
ना अहत हों, रहें अजित ही
सङ्ग मिले तेरा सदा
हे अजित! हे सोमदेव !
चाहते हैं रस तेरा

जैसे ग्रीष्म के बाद होती
वृष्टि सन्सारोद्यान पर
होते हर्षित वृक्ष-वनस्पतियाँ
हरित उत्थान पर
हम भी हैं सन्सार रूपी
महा उद्यान के धाम पर
हे अजित! हे सोमदेव !
चाहते हैं रस तेरा

तुमसे मिलने वाला यह
जीवन का रस है सोमरस
जो है आत्मा का विकासित
उन्नत बल कल्याणप्रद
माँग रहा तुमसे सकल जग
मैं भी माँगूँ रस यह अन्तस्
हे अजित! हे सोमदेव !
चाहते हैं रस तेरा

मेरे इन मानव सखाओं
के लिए होवो क्षरित
अहति-स्वस्ति अजीति आदि
आशाओं में रहो त्वरित
चर-अचर सन्सार के लिए
दान करो रस-वर्षक अमृत
हे अजित! हे सोमदेव !
चाहते हैं रस तेरा

ऐसा बरसा, इस विशाल
ब्रह्माण्ड में अमृत झरे
सब जीवों और प्राणियों का
सर्वोन्नति-दीपक जले
अपने इस तुच्छ प्राणी को भी
तुमसे अमृत-रस मिले
हे अजित! हे सोमदेव !
चाहते हैं रस तेरा
ना अहत हों, रहें अजित ही
सङ्ग मिले तेरा सदा
हे अजित! हे सोमदेव !
चाहते हैं रस तेरा

ओ३म् अजी॑त॒येऽह॑तये पवस्व स्व॒स्तये॑ स॒र्वता॑तये बृह॒ते ।
तदु॑शन्ति॒ विश्व॑ इ॒मे सखा॑य॒स्तद॒हं व॑श्मि पवमान सोम ॥
ऋग्वेद 9/96/4

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई