आशिक जो शराब की प्याली के

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आशिक जो शराब की प्याली के

आशिक जो शराब की प्याली के,
अपनी औलाद के दुश्मन हैं
वो दर पै खड़े कंगाली के,
कंगाली तो धुन्दला दर्पण है॥ टेक ॥
अभिशाप है घर की कंगाली,
चेहरों की उड़ जाती लाली।
बदनामी से रिश्ते टूटते हैं,
घर बेटी जवां जर से खाली॥
भाभी बनी सबकी घरवाली,
चिथड़ों से फटे ढांपा तन है॥1॥

जहां पर चले दौर शराबों के,
मुजरों के और आदाबों के।
बेनूर हैं नूरानी शक्लें,
बुझ गये चिराग हैं ख्वाबों के ॥
राजा उमराव नवाबों के,
हिलते देखे सिंहासन हैं॥2॥

पीते हैं जो पीकर घर आते,
दीवारों से सर को टकराते।
ठोकर जो लगी नालीमें गिरे,
गिरने पै नहीं फिर उठ पाते॥
कुत्ते भी इनायत कर जाते,
कहते अब वर्षा सावन है॥3॥

कुछ लोग बड़े जो बनते यहां,
अपनी खो बैठे शर्मो हया।
कोठों की ये सीढ़ी चढ़ते हैं,
घर की औकात को भूले वहाँ॥
दावत में शराबों की जाते,
जहां इनका दिखता नंगापन है॥4॥

लानत ऐसों पै जो पी-पी कर,
बीबी के बेच दिये जेवर।
मयखाना तो बादस्तूर मगर,
इसका नीलाम हुआ घर दर॥
नीचे धरती ऊपर अम्बर,
टुकड़ों को भटकता बचपन है॥5॥

क्या कहियेगा ऐसे गरीबों को,
लुटने पर रोते नसीबों को।
एक-एक करके सब बेच दिया,
छोड़ा नहीं घर की चीजों को॥
तड़फाकर मारा बीबी को,
चिन्ता ने की चिता के अर्पण है॥6॥

मत पीना नशे के पानी को,
करती बरबाद जवानी को।
सागर ये सुराही जां लेता,
समझो तो इस नादानी को॥
इज्जत बख्शो उस रानी को,
जो घर का सजाती आंगन है॥7॥

धर्म की गरिमा जाँ लेन तुली,
महादेव की जहांपर जय बुली।
मन्दिर के ही मूर्ति के पीछे,
कर्मठ सच मधुशाला है खुली॥
ले लेता पुजारी मामूली,
ले आरती में लगता मन है॥8॥