आर्य महासम्मेलन गुरदासपुर (पंजाब)
संत शिरोमणि पूज्य गुरुवर स्वामी सर्वानंद जी महाराज के 124वें जन्मोत्सव को समर्पित दयानन्द मठ दीनानगर में आर्य महासम्मेलन।
दिनाँक 12-13-14 अप्रैल 2024
अध्यक्षता – पूज्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी
अध्यक्ष दयानन्द मठ, दीनानगर (पंजाब)
आप समस्त परिवार एवं इष्ट मित्रों सहित सादर आमन्त्रित हैं।
जन्म तथा प्रारंभिक शिक्षा :-
दिनाक 13 सन् 1900 ई.को इस महान विभूति ने रोहतक जिला के गांव सासरोली में एक क्षत्रिय परिवार में जन्म लिया । आपके इस जन्म परिग्रह से श्रीमती फूला देवी एवं श्रीमान हरदयाल सिंह ने मातृत्व एवं पितृत्व प्राप्त कर अपने आपको सौभाग्यशाली समझा।
बालक के निहित गुणों को जान सुयोग्य माता पिता ने गुणानुरूप – ‘रामः चन्द्र इव चकासते इति’ रामचन्द्र नाम रखा । रामरूपी चन्द्र ने अपनी सौम्यता, सुशीलता एवं विनम्रता शालिनि प्रतिभारूपी चन्द्रिका से समस्त गुरुजनों को आल्हादित करते हुए जाट कॉलेज रोहतक से दशम कक्षा उर्तीण की।
आर्य समाज की ओर :-
ग्राम सासरोली में आर्य समाज मन्दिरनहीं था परन्तु कुछ आर्य समाजी थे। जिनके कारण ग्राम में ही श्री रामचन्द्र जी को आर्यसमाज से परिचय होने का अवसर मिला । महाराज के समकालीन स्वामी विद्यानन्द जी (सासरोली निवासी) बताते हैं कि प्रभु भक्ति गुण स्वामी जी में बचपन से ही था ।
वैराग्य :-
स्वामी जी के जीवन में सन् 1910 का वर्ष विशेष महत्व रखता है। आर्य समाज के इतिहास में भी यह वर्ष विशेष स्थान रखता है । गुरूकुल शिक्षा प्रणाली के जन्मदाता श्री मुन्शी राम से जगत् प्रसिद्ध सन्यासी स्वामी श्रद्धानन्द बनने का था। सन्यास दीक्षा के समय आप वहां उपस्थित थे। 10 वर्षीय किशोर रामचन्द्र को निश्चय ही आपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए इस अवसर ने प्रेरित किया।
स्कूल जीवन में अध्ययन और खेलकूद में अपने सहपाठियों में अग्रणी होने के कारण अध्यापकों और मित्रों के प्रिय रहे । विचारों की स्पष्टता के साथ – साथ संस्कृत भाषा सीखनें व वेदों का अध्ययन करने की आपकी लग्न तीव्र से तीव्रतर होती गयी ।
ऐसे समय में अवसर आ गया मथुरा जन्म शताब्दी का । वहां आपने आर्य सन्यासियों, वेद के विद्वानों, कर्मठ निष्ठावान आर्य नेताओं को सुना और निकट से देखा तो आप में नई स्फुर्ति का प्रादुर्भाव हुआ । मथुरा शताब्दी से पूर्व एक बार दिल्ली के परेड मैदान पर आर्य समाज की ओर से एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा को सम्बोधित करने के लिए आर्य जगत् के मूर्धन्य सन्यासी आचार्य स्वामी स्वतन्त्रनन्द जी महराज भी पधारे थे। इस सभा को सुनने के लिए आप भी पहुंचे थे । खाली समय में मैदान के एक भाग में बैठकर आप स्वाध्याय में सलंग्न थे कि स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज का उधर आगमन हो गया । यही गुरु शिष्य की प्रथम भेंट आर्य जगत् के लिए मणिकांचन – सहयोग सिद्ध हुआ। शिष्य ने गुरु पा लिया और गुरु को शिष्य मिल गया ।

आर्य सिद्धान्तों का अअध्ययनः-
आपने आर्य समाज के प्रचारऔर प्रसार के लिए वैदिक सिद्धान्त और महर्षि दयानन्द के मन्तव्यों को भली प्रकार जानने वाले आर्य प्रचारक को तैयार करने हेतु लाहौर में श्री मद् दयानन्द उपदेशक महाविद्यालय के विद्यार्थी बन गये तथा योग्य गुरुओं के चरणों में बैठकर शास्त्रों का गहन अध्ययन प्रारम्भ किया ।
ज्ञान की साधना करते हुए महाविद्यालय की सिद्धान्त शिरोमणि की उपाधि सन् 1932 ई. में प्राप्त कर प्रथम स्नातक होने का गौरव प्राप्त किया। सन् 1942 ई. आपकी पुज्य माता श्री मती फूला देवी का निधन हो गया। परिवार के लोगों ने आपको भी सुचना दी परन्तु आप अन्त्येष्टि एवं किसी शोक सभा में सम्मिलित होने नही गये।
यही सन्यास की मर्यादा है। आर्य समाज इस दृष्टि से भाग्यशाली है कि ऋषि की शिष्य परम्परा में एक ऐसा आदर्श सन्यासी है, जिसने अपने व्यवहार से आर्यमर्यादा का पूरा – पूरा पालन व रक्षा की है। आने वाले युग में आर्य सन्यासियों के लिए स्वामी जी महाराज का शुभ आचरण एक अनन्य उदाहरण रहेगा । आज भी सभी के मुख से हम यही सुनतें हैं ‘ सन्यासी हो तो ऐसा ।’
कर्म क्षेत्र में पदार्पण :-
स्नातक बनने के उपरान्त 1933 से 1936 ई. तक आपने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के अन्तर्गत वेद प्रचार का कार्य सम्भाला। स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज खेमकरण से एक थैला और एक आसन लाये थे, वे दोनों वस्तुयें शिष्य को भेंट कर दीं और सबसे पहले गोजरा जिला लायलपुर में प्रचार करने के लिए भेजा ।
दयानन्द मठ के स्तम्भरूप वयोवृद्ध सेवक वैद्य सांई दास जी की जन्मस्थली यही गोजरा कस्बा है। सभा ने जहां जाने को कहा ग्राम हो या कस्बा, झोंपड़ी हो अथवा गगनचुम्बी अट्टालिका आप सहर्ष जाने को तैयार रहा करते थे। एक बार आपको वैरपु टामवाले (बहावलपुर) में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। आपने वहां धर्म प्रचार किया। प्रचार करते हुए आपको एक आलौकिक आनन्द की अनुभूति हुई। लाहौर लौटकर आपने बड़े गर्व से प. चमूपति जी से कहा, ” मैं आपके ग्राम की यात्रा कर आया हूँ।” कवि हृदय प. चमूपति झट से बोल उठे “तो पण्डित जी आप हमारे पूज्य पुराहित हो गये । हमारे घर चलें हम आपको भोजन

उपदेशक विद्यालय में:-
उपदेशक विद्यालय में पं. नरदेव जी केदेहान्त के बाद किसी योग्य व्यक्ति का चयन करना सभा के सामने कठिन समस्या थी । नाम तो कई आये परन्तु सहमति न बन सकी । तब पं. रामचन्द्र जी का नाम इस स्थान के लिए सुझाया गया । सभा ने सर्वसम्मति से आपको उपदेशक विद्यालय का प्राध्यापक नियुक्त किया ।
दयानन्द मठ की स्थापना:-
मठ की स्थापना के लिए स्वामीस्वतन्त्रानन्द जी महाराज को कई स्थानों से आर्यों ने निमन्त्रण दिये, परन्तु दीनानगर में (पठानकोट से अमृतसर जाने वाले राजमार्ग) पर स्वर्गीय शास्त्रार्थ महारथी महाशय योगेन्द्रपाल जी की कुटिया (देव भवन ) में सन् 1938 ई. में आपने दयानन्द मठ की स्थापना कर दी। गुरु जी के आदेशानुसार 1 अप्रैल सन् 1941 ई. को पं. रामचन्द्र जी ने मठ का आन्तिरिक प्रबन्ध संभाल लिया। चिकित्सा व सेवा का अनवरत चलने वाला व्रत स्वीकार कर लिया। मठ के प्रत्येक कार्य और सदस्यों की आप स्वयं देखभाल करते थे।
पूज्य स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज ने जब मठ की स्थापना की तो यह एक नियम बनाया कि एक समय का भोजन भिक्षा से आया करेगा। यह नियम तभी से आज तक अनवरत चला जा रहा है। ‘गुरुविच्छेत शिष्यात् पराभवम्’ इस सुक्ति का अनुसरण करते हुए अपने आदर्श गुरु का कार्य आगे बढ़ाया और उनकी इच्छा के अनुरूप यश एवं ख्याति अर्जित की ।
सन्यास दीक्षा :-
3 अप्रैल 1954 ई. को गुरु के देहावसान केपश्चात् अपने गुरु के आदेश का पालन करते हुए 1 मई 1954 को श्री स्वामी वेदानन्द जी तीर्थ महाराज से सन्यास की दीक्षा ली। इस अवसर पर आर्य जगत् के मूर्धन्य विद्वद्धन तथा अधिकारी उपस्थित थे । संस्कार विधि के अनुसार स्वामी सर्वानन्द जी ने भिक्षा भी मांगी । महाशय कृष्ण जी ने सर्वप्रथम आपके चरण स्पर्श किये। पश्चात् सभी प्रतिष्ठित आर्यों ने स्वामी जी का अभिवादन किया। वे नयन कितने सौभग्यशाली थे जिन्होनें श्री महाराज जी का सन्यास दीक्षा का महोत्सव देखा ।

त्यागमूर्ति :-
समाज, राष्ट्र एवं प्राणिमात्र के हित को सर्वोपरि माननाहुए आपने हिन्दी तथा गौ रक्षा आन्दोलनों में अग्रणी होकर भाग लिया । आर्य जगत् के समस्त ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ एवं सन्यस्त मण्डल की स्थापना की। जिसके नेतृत्व में यह मण्डल महर्षि दयानन्द के कार्यों को सुचारू रूप से कर रहा है। पूज्य स्वामी जी ने ब्रह्मचारी जगदीश चन्द्र की मठ के प्रति सेवा भावना एवं निष्ठा को देखते हुये पहले उन्हें गुरुकुल का आचार्य नियुक्त किया । तत्पश्चात् 1994 को श्रद्धेय स्वामी जे ने आचार्य जगदीश जी को सन्यास की दीक्षा देकर स्वामी सदानन्द सरस्वती नाम दिया ।
उसके बाद पूज्य स्वामी जी मठ का हर एक कार्य स्वामी सदानन्द जी के परामर्श से करने लगे। 4 नवम्बर सन् 1994 को अजमेर में ऋषि मेले के अवसर पर आर्य जगत् ने आपका अभिनन्दन करते हुए 31 लाख रूपये की राशि भेंट स्वरूप प्रदान की। त्याग का आदर्श प्रस्तुत करते हुए आपने यह राशि वैदिक धर्म के प्रचारार्थ परोपकारिणी सभा को सौंप दी। इस प्रकार अन्य अवसरों पर आपने ऐसा ही आदर्श प्रस्तुतकिया।
गुरुणाम गुरु :-
स्वामी ओमनंद जी महाराज, स्वामी आनंद बोध जी महाराज, स्वामी सुमेधानंद जी महाराज (राजस्थान), सुमेधानंद जी (चंबा), स्वामी सदानंद जी (दीनानगर), स्वामी वेदानंद जी (उत्तरकाशी), श्रद्धा स्वामी आनंदानंद जी सरस्वती, हरिश्चंद्र गुरु जी (महाराष्ट्र) आदि आर्य जगत के योग्यतम सन्यासियों ने आपको ही अपना सन्यास दीक्षा गुरु धारण सन्यास ग्रहण कराया है। इस प्रकार ‘गुरुणां गुरुः’ से ‘जगत गुरु’ के गरिमामय दर्शन को सुशोभित कर रहे हैं।
प्रभु तेरी इच्छा पूर्ण हो:-
9 नवम्बर मंगलवार प्रातः 9 बजे सन्2004 को दीपावली से तीन दिन पूर्व धनतेरस के दिन स्वामी सदानन्द जी को मठ की बागडोर सोंप ‘प्रभु तेरी इच्छा पूर्ण हो कहकर स्वामी जी निर्वाण को प्राप्त हुये। ईश्वर हम सबको उनके बताये मार्ग पर चलने की प्रेरणा एवं शक्ति दें ।

कार्यक्रम
1 से 11 अप्रैल 2024 :-
ग्रामीण क्षेत्रों में आर्य जगत के विभिन्न प्रान्तो से आये हुये सन्यासियों, भजनोपदेशको एवं महोपदेशकों द्वारा वेदप्रचार यात्रा होगी।
सुबह
12 से 13 अप्रैल 2024 :-
यज्ञ/भजन आर्य सम्मेलन :- 6:30 से 8:00 बजे तक 9:00 से 12:00 बजे तक ।
शाम
यज्ञ/भजन/प्रवचन….. 6:00 से 8:00 बजे तक।
13 अप्रैल वैदिक यतिमण्डल सम्मेलन दोपहर 2 से 5 बजे तक होगा ।
14 अप्रैल 2024
अर्थववेद परायण यज्ञ पुर्णाहुति यज्ञ…………. 8:00 से 09:30 बजे तक आर्य महासम्मेलन….. 10:00 से 02:00 बजे
ध्वजारोहण :-आचार्य राजेन्द्र नैष्टिक, (गुरुकुल कालवा जीन्द हरि.)
अध्यक्षता :- स्वामी सदानन्द सरस्वती (अध्यक्ष दयानन्द मठ दीनानगर)
मुख्य अतिथि :- श्री प्रेम भारद्वाज (महामंत्री आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब):- श्री विनय आर्य (महामन्त्री आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली)
विशिष्ट अतिथि :- श्री अशोक परूथी (रजिस्ट्रार आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब) :-श्री सुधीर शर्मा (कोषाध्यक्ष आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब) श्री सुदेश आर्यरत्न (मन्त्री आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब) :-श्री राकेश मैहरा (मन्त्री केन्द्रिय सभा अमृतसर):-
आमन्त्रित विद्वान :- श्री पं. विजय कुमार शास्त्री (महोपदेशक आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब):- श्री पं. नारायण सिंह (महोपदेशक आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब):- श्री पं. संदीप आर्य (युवा क्रान्तिकारी भजनोंपदेशक पानीपत हरियाणा):- श्री पं. अरूण वेदालंकार (भजनोंपदेशक आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब):- श्री पं. राजेंद्रव्रत दाल शास्त्री (पुरोहित आर्य समाज बाजार लौंडा)
संयोजक :- डॉ. बलविन्द्र शास्त्री (दयानन्द मठ दीनानगर) (सम्मान, धन्यवाद एवं शान्ति पाठ के बाद सम्मेलन समापन)
ऋषि लंगर निरन्तर चलता रहेगा ।










