अर्थीं उठाके यार ही श्मशान ले चले
स्वरः – अपने किये पे कोई पशेमान हो गया
अर्थीं उठाके यार ही श्मशान ले चले
क्या क्या थे मेरे
दिल में सब अरमान ले चले।।
खुद गर्जियों की आंधी अन्धा
बना गई हम जिन्दगी को
कितनी अन्जान ले चले ।।१।।
मेरे हसीन बंगले मखमल के
वो गलीचे अफसोस हाय
कुछ भी ना सामान ले चले।। २।।
सिर था बड़ा हठीला झुकना
ना इसने जाना तोडेगा बांस
लम्बा जो अमिमान ले चले।। ३।।
नेकी मेरी सुरेन्द्र ऐसी तो
कुछ नही थी फूलों के हार
फिर क्यों नादान ले चले।।४।।










