अपनी सत्ता से परमेश्वर

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अथ अघमर्षण मन्त्राः

ओं ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत ।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः ।।१।।

अपनी सत्ता से परमेश्वर,
प्रकृति से जगत् बनाकर ।
ज्ञान दिया जग गुरु कहलाया,
वेदों का प्रकाश फैलाया।।
जीव वृक्ष पृथ्वी के अन्दर,
सागर नदियाँ रचे समुन्दर ।
जिस सत्ता से जग उपजावे,
उसी से जग में प्रलय लेआवे ।।

ओं समुद्रादर्णवादधि,
संवत्सरो अजायत ।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य
मिषतो वशी ।। २ ।।

जगत को वश में रखने वाले,
परमेश्वर के खेल निराले।
रात बनाई दिवस बनाया,
काल को हिस्से कर दिखलाया।।

ओं सूर्याचन्द्रमसौ धाता,
यथापूर्वमकल्पयत् ।
दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः ।। ३ ।।

ऋ० मं० १०/सू० १९०।
चन्द्र सूर्य भूमण्डल तारे,
लोक लोकान्तर रच के सारे।
नियम रखे इस में भी ऐसे,
थे पहले कल्पों में जैसे।।

इस मन्त्र से तीन आचमन करें।