अपने लिये जो औरों से चाहता है बर्ताव।(धुन-शोखियों में घोला जाये फूलों का)
अपने लिये जो औरों
से चाहता है बर्ताव।
औरों के लिये कार्य मे
परिणत कर वह भाव ।।
आयेगी जो हृदय से पुकार,
वह धर्म है।। टेक ।।
लज्जा भय और शंका
जिस कर्म के अन्दर आये।
वही कर्म दुनिया में एक
पाप कर्म कहलाये ।।
जाने पहचाने फिर
भी ना माने, अधर्म है।।1।।
देखने तक ही सीमित है
बस वही पशु कहलाता ।
जिसमें हो मननशीलता
वह जीवन मनुष्य पद पाता ।।
मन में और वचन में कर्म
में जो एक हो, शुभ कर्म है।।2।।
ईश्वर जीव प्रकृति हैं
तीनो अनादि अनश्वर।
प्रकृति सत् जीव सत्चित
सत्चित आनन्द है ईश्वर ।।
प्रकृति की छाया-जीव
पर जो आये वह भ्रम है।।3।।
सबका भाग बराबर ही
को तो कहें सम्पत्ति ।।
यदि सम्पत्ति ना है तो
सम्पत्ति हो विपत्ति।
‘प्रेमी प्रेम आये सकुचाये
न बताये, वह शर्म है।।4।।










