अपने आदर्शों का सूरज ढल गया।
अपने आदर्शों का
सूरज ढल गया।
देश में चक्कर
विदेशी चल गया ।।
चले गये अंग्रेज
भारत छोड़ कर ।
वृक्ष तो अंग्रेजियत
का फल गया ।।
नग्नता दुनियां में,
बढ़ती जा रही।
इस कदर फैशन
घरों में पल गया ।।
गैरों की क्या बात,
करते हो यहां।
जब सगे भाई को
भाई छल गया।।
बिजलियां ऐसी गिरीं,
इस पेड़ पर।
सभ्यता का घोंसला
ही जल गया।।
धर्म कागज का,
खिलौना बन गया।
चन्द बूंदें गिर पड़ीं,
और गल गया।।
पथिक भ्रष्टाचार,
फैला इस कदर।
इन दिलों पर कौन,
कालिख मल गया ।।










