🌷 अनमोल― वचन 🌷
1. भाग्य पर नहीं, चरित्र पर निर्भर रहो।
2. सत्कर्म ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है।
3. अदालत और पुलिस से बच सकते हैं, ईश्वर से नहीं।
4. शीलवान होना किसी भी वस्त्रालंकार से बढ़कर है।
5. भूल सुधार मनुष्य का सबसे बड़ा विवेक है।
6. फल की आतुरता प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।
7. शालिनता बिना मोल मिलती है और उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।
8. ईश्वर सभी को श्रेष्ठ उत्तरदायित्व सोंपता है, पर प्रसन्न उन्हीं पर होता है, जो उन्हें निभाते हैं।
9. सुअवसरों की प्रतीक्षा में न बैठो, उद्यम के लिए हर घड़ी शुभ मुहूर्त और हर पल सुअवसर है।
10. कलियुग का बुरा समय केवल उन्हें प्रभावित करता है जो अपनी सुरक्षा में सतर्क नहीं रहते।
11. मनुष्य एक भटका हुआ देवता है, सही दिशा पर चल सके तो उससे बढ़कर श्रेष्ठ और कोई नहीं।
12. गृहस्थ एक तपोवन है,जिसमें संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।
13. प्रतिभाशाली का पाप समाज का बहुत बड़ा अहित करता है।
14. प्यार और सहकार से भरा-पूरा परिवार ही धरती का स्वर्ग होता है।
15. फूलों की सुगन्ध हवा के प्रतिकूल नहीं फैलती, पर सद्गुणों की कीर्ति दशों दिशाओं में फैलती है।
16. प्रेम समस्त सत्प्रेरणाओं का स्रोत है।
17. जो ज्ञान मनुष्य के अच्छे संस्कारों को जाग्रत करे और उसकी उत्तम वृत्तियों को बढ़ाकर ऊंचा उठा दे वही विद्या है।
18. जो असत्य और अनौचित्य को इसलिए स्वीकार करता है कि प्रतिरोध करने पर उसे झंझट में फंसना पड़ेगा, वह वस्तुतः नास्तिक है।
19. सत्प्रयोजन में संलग्न होने वाले जो खोते हैं, उससे कहीं अधिक पाते हैं.
20. मानवता का ही दूसरा नाम भारतीय धर्म, भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति है, हमारे पूर्वज मानवता के उपासक रहे हैं। मनुष्य को मनुष्य बनाने की वास्तविक शक्ति भारतीय संस्कृति में ही है।
21. प्रलोभन एक तेज आंधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखता है।
22. किसकी मैत्री किनसे है यह पता लगा लेने के बाद उसका चरित्र जानना कुछ कठिन नहीं रह जाता।
23. किसी को कुछ देना हो तो सर्वोत्तम उपहार आत्म विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन ही हो सकता है।
24. मनुष्य के व्यक्तित्व का सच्चा परिष्कार तो कठिनाइयों में ही होता है।
25. मनुष्य में नहीं, ईश्वर में विश्वास रखो, वह तुम्हें रास्ता दिखायेगा और सन्मार्ग सुझायेगा।
26. लाभ, सुख, सफलता, प्रगति आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरुरत नहीं है, न जाने यह स्थिति कब तक रहेगी।
27. कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूलमन्त्र है।
28. कर्तव्य के पालन का आनन्द लूटो और विघ्नों से बिना डरे जूझते रहो, यही है धर्म का सारतत्व।
29.मानव जीवन की सार्थकता के लिए विचारों की पवित्रता अनिवार्य है, मात्र ज्ञान, भक्ति और पूजा से मनुष्य का विकास एवं उत्थान नहीं हो सकता।
30. आत्म-विश्वास का अर्थ है-अपनी परिस्थितियों और समस्याओं का हल अपने आप में ढूंढना।
31. यदि बिगाड़ को रोकने के लिए हम कुछ नहीं करते, तो आगामी पीढ़ियाँ इस निष्क्रियता के लिए हमें क्षमा नहीं करेगी।
32. आत्मा के अभाव में शरीर की कीमत दो कौड़ी की नहीं रहती,इसी प्रकार आत्म-बल के अभाव में तीनों-धनबल,बाहुबल,बुद्धिबल मात्र खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।
33. वस्तुतः आचार निष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं।
34. मनुष्य का चरित्र विचार और आचार दोंनो से मिलकर बनता है।
35. आत्मा की तेजस्विता सदाचार से बढ़ती है और बनी रहती है।
36. जिस समाज में झूठ का बोलबाला जितना अधिक होगा, वह उतना ही पतित और अविकसित होता जायेगा।
37. सम्मान केवल परमार्थी और सदाचारी लोगों के लिए सुरक्षित रहना चाहिये।
38. सामूहिक/समाजगत पापों का दण्ड़-ईश्वर हमें बाढ़,भूकम्प,दुर्भिक्ष,महामारी,अतिवृष्टि,अनावृष्टि,युद्ध आदि दैवी प्रकोपों के रुप में दिया करता है,सामूहिक दोषों को हटाने का प्रयत्न न करना,उनकी और उपेक्षा की दृष्टि रखना भी एक पाप है।










