अंगूठा देख चकरा गई

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अंगूठा देख चकरा गई

अंगूठा देख चकरा गई,
पढ़ा नाम तो फिर घबरा गई।
राम की अंगूठी हे भगवान
कहां से आ गई।।


नहाते समय उतार नाथ ने
अंगूठी रख दई होगी।
वह पत्ता उड़ गया हवा में
जिससे यह ढक दई होगी।


किसी पक्षी ने उठा लई,
यहां आकर के गिरा दई।
राम की अंगूठी हे भगवान
कहां से आ गई।।1।।

मेरी खोज करने के लिए
विमान में चढ़ रघुनाथ चले।
चिन्ता के सागर में डूबे
नीचे लटका हाथ चले।
सुध अंगूठी की ना रही,
यहां अंगुली को झटका दई।
राम की अंगूठी हे भगवान
कहां से आ गई।।2।।

नहीं समझ में आता है
मैंने काफी देर विचार किया।
क्या धोखे से रावण ने
श्रीराम को जा गिरफ्तार किया।
यह सृष्टि नई रचा दई,
यहां अंगूठी भिजवा दई।
राम की अंगूठी हे भगवान
कहां से आ गई।।3।।

‘शोभाराम’ कोई सुनता हो
तो मेरा दुख मिटाइयो रे।
कैसे आई यहां अंगूठी
मुझको भेद बताइयो रे।
जिन्दगी की आशा न रही,
मैंने मरने की ठहरा दई।
राम की अंगूठी हे भगवान
कहां से आ गई।।4।।