अन्धेरों ने मेरे नयन छिन कर

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अन्धेरों ने मेरे नयन छिन कर

स्वरः – बहारों ने मेरा चमन छिन कर

अन्धेरों ने मेरे नयन छिन कर
उलझनो का मुझे दान क्यों दे दिया है।।
मै छलता रहा हूं सभी से सफर में।
महाजन भी मिले राहजनों की तरहा।
हठीली आस्थाओं से कुंठित
विषेला मधुपान क्यों दे दिया है।।१।।

अनेकों बताते है मंजिल मेरी कोई
साथ चलते चलाते नही नसीबों में
जिनके मिली रोशनी उन्हे ऐसा
अभिमान क्यो दे दिया है।। २।।

खता है मेरी या रूढ़ियों के
बन्धन हो गई है ये निष्ठुर रस्मों
की उलझन सुरेन्द्र मिली
ठोकरे हर कदम पर गतिहीन
अज्ञान क्यों दे दिया ।।३।।