अन्धेरा तो जगत का था ऋषिवर आप क्यूँ रोए ?
थे आँसू दीन दुःखियों के ऋषिवर आप क्यूँ रोए ? ॥
धर्म के नाम पर मनमनीयाँ करते फरेबी थे
जहाँ भटका दिया लोगों को बिन कारण भटकते थे
थे दुःख तो भ्रमितों के ऋषिवर आप क्यूँ राए?
ये मूरख कह रहे थे नारीयों को पैर की जूती
सति विधवाएँ बेबस थीं, थीं उनकी किस्मतें फूटीं
दशा तो बिगड़ी नारी की ऋषि वर आप क्यूँ रोए ? ॥
कहाँ इक देश ऋषियों का, कहाँ ये वहशियों का था?
कहाँ वो वेदों का सत्पथ, कहाँ ये सम्प्रदायाओं का?
था भाई भाई में आपस का झगड़ा आप क्यूँ रोए ? ॥
हुई थी दुर्दशा दलितों की आँहे भरती साँसों में
दया भी दफन थी गौओं की बेबस भीगी आँखों में
कटी तो गर्दनें उनकी ऋषिवर आप क्यूँ रोए ? ॥
स्वदेशी राज्य ही बेहतर कहें दयानन्द स्वामीजी
कोई कितना करे अच्छा, न इच्छा है गुलामी की
गुलामी में तड़पना तो हमें था आप क्यूँ रोए ? ॥
सच्चाई की थी ये अग्नि परीक्षा जहर खाने की
न ख्वाहिश थी कभी असत्य पथ पर जिन्दगानी की
समय था जब विदाई का ऋषिवर आप ना रोए ? ॥
दयानन्द सा दयालु क्या कभी किसी युग में होता है
कहाँ इच्छा प्रभु की लेके हँसनेवाला होता है
जिन्हें विष देके हँसना था वो छाती पीट क्यूँ रोए ? ॥










