अन्धेरा क्या उजाले में भी दिल हिलने लगे अब तो।

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गीत न०-12 गजल

अन्धेरा क्या उजाले में भी
दिल हिलने लगे अब तो।
सितम को देखकर पत्थर
भी पिघलने लगे अब तो॥
उदासी आज चेहरों पर
नजर से देखिये जिसको ।
नहीं कोई सुनने वाला है
सुनायें दास्तां किसको॥
बसे परिवार भी घर छोड़कर
चलने लगे अब तो॥1॥

सिसकती बिन्दी मांथे
की पुंछे सिन्दूर रोते हैं।
यहां बेटों की लाशों
को बेचारे बाप ढोते हैं॥
आँख से आँसू मासूमों की
भी ढलने लगे अब तो ॥2॥

मरा है कौन ये किसका
लहू रंगता है धरती को।
कौन हर रोज ही कन्धा
यहां अब देगा अर्थी को॥
कफन के वास्ते भी हाथों
को मलने लगे अब तो ॥3॥

हाथ की चूड़ियां मेंहदी का
रंग मातम मनाता है।
सन्नाटा मौत का कोई भी
दिन खाली न जाता है॥
रहनुमां कहते कर्मठ दिन
बुरे ढलने लगे अब तो॥4॥