आनन्द स्रोत बह रहा

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आनन्द स्रोत बह रहा

आनन्द स्रोत बह रहा,
पर तू उदास है
आनन्द स्रोत बह रहा,
पर तू उदास है
अचरज है जल में रह के,
मछली को प्यास है

फूलों में ज्यों सुवास,
ईख में मिठास है
वैसे ही तो उस ईश का
घट-घट में वास है
आनन्द स्रोत बह रहा
पर तू उदास है

कुछ तो समय निकालो,
प्रभु भक्ति के लिए
नर-जन्म का उद्देश्य,
न भौतिक विलास है
आनन्द स्रोत बह रहा
पर तू उदास है

टुक ज्ञान-चक्षु खोल के,
तू देख तो सही
जिसको तू ढूँढ़ता है,
सदा तेरे पास है
आनन्द स्रोत बह रहा
पर तू उदास है

आनन्द मोक्ष का तू न,
पायेगा जब तलक
जब तक “प्रकाश” तू,
इन इन्द्रियों का दास है
आनन्द स्रोत बह रहा,
पर तू उदास है
अचरज है जल में रह के ,
मछली को प्यास है
आनन्द स्रोत बह रहा
पर तू उदास है

रचना: आर्य कवि श्री प्रकाश चन्द्र जी
स्वर :- पूज्या साध्वी माता पुष्पा शास्त्री जी

उल्लेखनीय है की यह भजन ऋग्वेद के
मन्त्र 7/89 से प्रेरित है

अपां मध्ये तस्थिवांसम्, तृष्णाऽविदज्जरितारम्
मृळा सुक्षत्र मृळय

ऋग्वेद 7/89/4

अर्थात्
सुक्षत्र (हे शुभ शक्तिवाले !!!)
जरितारम् (मुझ स्तोता को)

अपां मध्ये तस्थिवांसम् (पानी के बीच में बैठे हुए भी)
तृष्णा (प्यास)
अविदत् (लगी है)
मृळा (मुझे सुखी कर)
मृळय (सुखी कर)